kehne ko to kya kya na dil-e-zaar men aa.e | कहने को तो क्या क्या न दिल-ए-ज़ार में आए

  - Jafar Tahir
कहनेकोतोक्याक्यादिल-ए-ज़ारमेंआए
हरबातकहाँक़ालिब-ए-इज़हारमेंआए
नज़दीकजोपहुँचेतोवोआहोंकाधुआँथा
कहनेकोतोहमसाया-ए-दीवारमेंआए
हरमौजा-ए-ख़ूँसरसेगुज़रजाएतोअच्छा
हरफूलमिरेहल्क़ा-ए-दस्तारमेंआए
हमअपनीसलीबोंकीहिफ़ाज़तमेंखड़ेहैं
अबजोभीशिकनगेसू-ए-दिल-दारमेंआए
पाँवमेंअगरतौक़-ओ-सलासिलहैंतोक्याग़म
हम-सफ़रोफ़र्क़रफ़्तारमेंआए
इकउम्रभटकतेहुएगुज़रीहैजुनूँमें
अबकौनफ़रेब-ए-निगह-ए-यारमेंआए
काशकभीउसकाइधरसेभीगुज़रहो
इकदिनतोसबालौटकेगुलज़ारमेंआए
जचतेभीतोक्याचश्म-ए-ख़रीदारमें'ताहिर'
हमकौनसेयूसुफ़थेजोबाज़ारमेंआए
  - Jafar Tahir
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