ye to nahin ki ham pe sitam hi kabhi na the | ये तो नहीं कि हम पे सितम ही कभी न थे

  - Jafar Tahir
येतोनहींकिहमपेसितमहीकभीथे
इतनाज़रूरथाकिवोनाग़ुफ़्तनीथे
चश्म-ए-इल्तिफ़ातयेक्याहोगयातुझे
तेरीनज़रमेंहमतोकभीअजनबीथे
फिरतेहैंआफ़्ताब-ज़दाकाएनातमें
हमपरकिसीकीज़ुल्फ़केएहसाँकभीथे
पामालकरदियाजोफ़लकनेतोक्याकहें
हमतोकिसीकमालकेभीमुद्दई'थे
क्याजुर्मथायेआजभीहमपरनहींखुला
येइल्महैकिअहल-ए-जुनूँकुश्तनीथे
हरलम्हातेरेइश्क़मेंउम्र-ए-अबदबना
जोदिनभीज़िंदगीकेमिलेआरज़ीथे
मुरझाकेभीगईमहकजिस्म-ए-नाज़की
येमोतिएकेफूलकोईकाग़ज़ीथे
यारान-ए-शहरइश्क़मेंबे-आबरूहुए
हमपरतोमेहरबाँवोकभीथेकभीथे
इक़्लीम-ए-आशिक़ीकोदियादीन-ए-शाइरी
हमसाहिब-ए-किताबथेगरचेनबीथे
हमजिनकीनज़्रकरतेजवाहरकलामके
'ताहिर'हमारेशहरमेंवोजौहरीथे
  - Jafar Tahir
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