waapsi par | वापसी पर

  - Jafar Sahni
वापसीपर
रातकेकालेसियहझूलेमेंलेटे
उसनेसोचाथा
किवोभी
दूसरोंकीतरह
हँसतीगुनगुनातीज़िंदगीसे
उन्सकीदहलीज़परजाकरमिलेगा
पूछेगाउससे
किरनसूरजकीकैसे
चूमतीहैफूलको
औरजगमगादेतीहैमिट्टीधूलको
ठंडीहवाक्याहै
घटाक्याहै
परिंदेचहचहातेकिसअदासहैं
मगरकुछभीहुआऐसानहीं
वोआजभी
वीरानखिड़कीसेउड़ाकर
ख़्वाबकीसबराख
जलतीधूपकोसरपरसमेटे
अंधेबहरेगूँगे
एहसासातसेममलू
सफ़रपरगामज़न
फिरहोगयाहै
औरउसकीसोच
बिल्कुलबाँझसीलगनेलगीहै
  - Jafar Sahni
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