tuloo-e-subh hai nazrein utha ke dekh zaraa | तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा

  - Jaan Nisar Akhtar
तुलू-ए-सुब्हहैनज़रेंउठाकेदेखज़रा
शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शबमुस्कुराकेदेखज़रा
ग़म-ए-बहारग़म-ए-यारहीनहींसबकुछ
ग़म-ए-जहाँसेभीदिलकोलगाकेदेखज़रा
बहारकौनसीसौग़ातलेकेआईहै
हमारेज़ख़्म-ए-तमन्नातूकेदेखज़रा
हरएकसम्तसेइकआफ़्ताबउभरेगा
चराग़-ए-दैर-ओ-हरमतोबुझाकेदेखज़रा
वजूद-ए-इश्क़कीतारीख़कापतातोचले
वरक़उलटकेतूअर्ज़समाकेदेखज़रा
मिलेतोतूहीमिलेऔरकुछक़ुबूलनहीं
जहाँमेंहौसलेअहल-ए-वफ़ाकेदेखज़रा
तिरीनज़रसेहैरिश्तामिरेगिरेबाँका
किधरहैमेरीतरफ़मुस्कुराकेदेखज़रा
  - Jaan Nisar Akhtar
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