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Iftikhar Bukhari
chalti rahtii hai
chalti rahtii hai | चलती रहती है
- Iftikhar Bukhari
चलती
रहती
है
दाएँ
बाएँ
आगे
पीछे
साथ
साथ
धीरे
धीरे
या
तेज़
क़दमों
से
जैसे
ख़िराम
करती
है
हवा
बे-पनाह
रातों
में
काँटों
और
झाड़ियों
में
बे-ख़बरी
के
नक़्शों
में
चलती
रहती
है
कोई
बे-मा'नी
गुफ़्तुगू
उम्र
गुज़ारने
के
लिए
दूरियों
के
दरमियान
हिज्र-ओ-विसाल
के
कोहरे
में
यख़-बस्ता
ख़ामोश
रस्तों
में
चलती
रहती
है
कुछ
देर
तक
कोई
ना-क़ाबिल-ए-फ़हम
चाल
अपने
ख़िलाफ़
आज़ुर्दा
वुसअ'तों
की
बिसात
पर
अज़ल
और
अबद
की
बे-मा'नी
हमेश्गी
में
जीने
की
जुस्तुजू
में
मरने
की
आरज़ू
में
- Iftikhar Bukhari
वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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उम्र-भर
के
सज्दों
से
मिल
नहीं
सकी
जन्नत
ख़ुल्द
से
निकलने
को
इक
गुनाह
काफ़ी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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उम्र
का
एक
और
साल
गया
वक़्त
फिर
हम
पे
ख़ाक
डाल
गया
Shakeel Jamali
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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आप
से
बाद
बिछड़ने
के
खुला
ये
हम
पे
उम्र
तन्हा
ही
गुज़र
जाती,
तो
अच्छा
होता
Chandan Sharma
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उम्र
से
मेरी
फ़नकारी
को
मत
आँको
उस्तादों
से
बेहतर
ग़ज़लें
कहता
हूँ
Harsh saxena
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सुब्ह
होती
है
शाम
होती
है
उम्र
यूँँही
तमाम
होती
है
Munshi Amirullah Tasleem
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उम्र
गुज़री
दवाएँ
करते
'मीर'
दर्द-ए-दिल
का
हुआ
न
चारा
हनूज़
Meer Taqi Meer
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जो
नासमझ
हैं
उठाते
हैं
ज़िन्दगी
के
मज़े
समझने
वाले
तो
बस
उम्र
भर
समझते
हैं
Amit Bajaj
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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