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Harsh saxena
umr se meri fankaari ko mat aanko
umr se meri fankaari ko mat aanko | उम्र से मेरी फ़नकारी को मत आँको
- Harsh saxena
उम्र
से
मेरी
फ़नकारी
को
मत
आँको
उस्तादों
से
बेहतर
ग़ज़लें
कहता
हूँ
- Harsh saxena
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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ख़ूब-सूरत
ये
मोहब्बत
में
सज़ा
दी
उसने
फिर
गले
मिलके
मेरी
उम्र
बढ़ा
दी
उसने
Manzar Bhopali
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बनाओ
ताजमहल
के
ब-जाए
ताश
महल
तमाम
उम्र
मुहब्बत
करो
गिराओ
बनाओ
Charagh Sharma
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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इक
उम्र
कट
गई
है
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐसे
भी
हैं
कि
कट
न
सकी
जिन
से
एक
रात
Firaq Gorakhpuri
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मैंने
चाहा
तेरे
जाने
में
न
कुछ
कमी
रहे
कोन
चाहे
उम्र
भर
ही
आँखों
में
नमी
रहे
Yogamber Agri
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आख़िर
को
हँस
पड़ेंगे
किसी
एक
बात
पर
रोना
तमाम
उम्र
का
बे-कार
जाएगा
Khursheed Rizvi
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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हम
क्या
जानें
जन्नत
कैसी
होती
है
उस
सेे
पूछो
जिसने
तुमको
पाया
है
Harsh saxena
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फ़रेब
दे
गया
इस
सादगी
से
वो
मुझको
कि
जुर्म
सारा
ही
मजबूरियों
के
सर
आया
Harsh saxena
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अपने
गले
लगा
ले
मुझे
यार
की
तरह
कब
तक
पड़ा
रहूँगा
यूँँ
बीमार
की
तरह
इल्ज़ाम
जिसके
हिस्से
के
बैठा
हूँ
सर
लिए
वो
देखता
है
मुझको
गुनहगार
की
तरह
आँखों
से
गुफ़्तुगू
की
तमन्ना
तो
है
मगर
नज़रें
हैं
हू-ब-हू
तेरी
तलवार
की
तरह
इक
रूह
की
तलब
मुझे
लाई
थी
मौत
तक
इक
जिस्म
ने
बचा
लिया
हर
बार
की
तरह
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Harsh saxena
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वफ़ादारी
की
क़स
में
खा
रहे
हैं
उन्हें
खोने
से
हम
घबरा
रहे
हैं
किसी
की
सादगी
का
है
करिश्मा
कि
हम
अब
हुस्न
से
कतरा
रहे
हैं
नए
मज़मून
पाने
की
तलब
में
उन्हें
दिन
भर
निहारे
जा
रहे
हैं
तुम्हारे
पाँव
जिन
पर
पड़
गए
थे
वही
पत्थर
तो
पूजे
जा
रहे
हैं
हिफ़ाज़त
से
उन्हें
ता-उम्र
रखना
तुम्हारे
ऐब
जो
गिनवा
रहे
हैं
दिवाने
इम्तिहान-ए-इश्क़
में
‘हर्ष’
हमारे
शे'र
पढ़कर
आ
रहे
हैं
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Harsh saxena
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दो
मुल्कों
के
सियासी
खेल
में
जाने
यहाँ
पर
कितनों
के
घर
उजड़े
हैं
मौला
वही
हर
सुब्ह
मंज़र
देखना
पड़ता
हज़ारों
लोग
यूँँ
ही
मरते
हैं
मौला
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Harsh saxena
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