kitne samundar | कितने समुंदर

  - Iftikhar Bukhari
कितनेसमुंदर
कितनेसहरा
जंगलऔरबारिशें
बे-शुमारआईनोंकाख़ाली-पन
लम्हेयासदियाँ
उबूरकरके
दाख़िलहुई
मेरीतन्हाई
तेरीतन्हाईमें
शहर-ए-गुल-ए-सुर्ख़
अज़ीमख़ूब-सूरतपत्थर
मुझेख़ज़ानेसे
कोईसरोकारनहीं
जहाँखूंटेसेबँधा
लालघोड़ा
तेईससौबरस
कीबे-ख़्वाबीमें
ईस्तादाहै
मुझेफ़क़ततेरीउदासरातका
एककोनादरकारहै
किमेरीख़ामोशी
तेरीख़ामोशीसेकलामकरे
मेरेपासअफ़्सोसकीकहानीहै
जिसेसुनकरक़दीमचाँद
रेतकेआँसूबहाएगा
कितेरेमातमीगुलाबसैराबहों
उड़तेज़मानोंकीधज्जियाँ
गुम-शुदा'उम्रोंकीराइगानी
तारीख़कीमुनाफ़िक़अलमारियोंमें
लटकतेउस्तुख़्वाँ
मुझेअमानतदारपाएँगे
बर्बाददीवारोंकीख़राशोंसे
झाँकताइंहिमाकनहींटूटेगा
गुलाबशहर
मैंबे-ज़बानक़िस्सा-गो
एकशब-बसरीकासवालीहूँ
तेरेसंगीनदरवाज़ेपर
मैंतुझेतेरेजैसा
अपनादिलहदियाकरूँँगा
पत्थरकागुलाब
तुझेख़ामोशदास्तानसुनाऊँगा
किसीबहुतक़दीमज़मानेकी
गुनाहगारख़ुदाओंसेदूर
ख़ालिसइबादतगुज़ारअँधेरेमें
सुब्ह-ए-अबदकेआख़िरीक़हक़हेसेबे-नियाज़
  - Iftikhar Bukhari
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