samajh rahe hain magar bolne ka yaara nahin | समझ रहे हैं मगर बोलने का यारा नहीं

  - Iftikhar Arif
समझरहेहैंमगरबोलनेकायारानहीं
जोहमसेमिलकेबिछड़जाएवोहमारानहीं
अभीसेबर्फ़उलझनेलगीहैबालोंसे
अभीतोक़र्ज़-ए-मह-ओ-सालभीउतारानहीं
बसएकशामउसेआवाज़दीथीहिज्रकीशाम
फिरउसकेबा'दउसेउम्रभरपुकारानहीं
हवाकुछऐसीचलीहैकितेरेवहशीको
मिज़ाज-पुर्सी-ए-बाद-ए-सबागवारानहीं
समुंदरोंकोभीहैरतहुईकिडूबतेवक़्त
किसीकोहमनेमददकेलिएपुकारानहीं
वोहमनहींथेतोफिरकौनथासर-ए-बाज़ार
जोकहरहाथाकिबिकनाहमेंगवारानहीं
हमअहल-ए-दिलहैंमोहब्बतकीनिस्बतोंकेअमीन
हमारेपासज़मीनोंकागोश्वारानहीं
  - Iftikhar Arif
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