kuchh bhi nahin kahii nahin KHvaab ke ikhtiyaar men | कुछ भी नहीं कहीं नहीं ख़्वाब के इख़्तियार में

  - Iftikhar Arif
कुछभीनहींकहींनहींख़्वाबकेइख़्तियारमें
रातगुज़ारदीगईसुब्हकेइंतिज़ारमें
बाब-ए-अताकेसामनेअहल-ए-कमालकाहुजूम
जिनकोथासर-कशीपेनाज़वोभीइसीक़तारमें
जैसेफ़साद-ए-ख़ूनसेजिल्द-ए-बदनपेदाग़-ए-बर्स
दिलकीसियाहियाँभीहैंदामन-ए-दाग़-दारमें
वक़्तकीठोकरोंमेंहैउक़दा-कुशाइयोंकोज़ो'म
कैसीउलझरहीहैडोरनाख़ुन-ए-होश्यारमें
आएगाआएगावोदिनहोकेरहेगासबहिसाब
वक़्तभीइंतिज़ारमेंख़ल्क़भीइंतिज़ारमें
जैसीलगीथीदिलमेंआगवैसीग़ज़लबनीनहीं
लफ़्ज़ठहरनहींसकेदर्दकीतेज़धारमें
  - Iftikhar Arif
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