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Shivam Mishra
zindagi ha
zindagi ha | ज़िन्दगी हमें जब उलझन तमाम देती है
- Shivam Mishra
ज़िन्दगी
हमें
जब
उलझन
तमाम
देती
है
मौत
चैन
का
फिर
दे
इक
पयाम
देती
है
- Shivam Mishra
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मिरे
सलीक़े
से
मेरी
निभी
मोहब्बत
में
तमाम
उम्र
मैं
नाकामियों
से
काम
लिया
Meer Taqi Meer
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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अब
मिरा
ध्यान
कहीं
और
चला
जाता
है
अब
कोई
फ़िल्म
मुकम्मल
नहीं
देखी
जाती
Jawwad Sheikh
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यही
अंजाम
अक्सर
हम
ने
देखा
है
मोहब्बत
का
कहीं
राधा
तरसती
है
कहीं
कान्हा
तरसता
है
Virendra Khare Akela
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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सोचता
हूँ
कि
उस
की
याद
आख़िर
अब
किसे
रात
भर
जगाती
है
Jaun Elia
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कोई
नहीं
है
जो
छुआ
हो
रूह
को
चाहत
सभी
को
जिस्म
की
ही
है
रही
Shivam Mishra
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वो
मेरा
आशियाँ
यूँँ
सजा
के
गया
जल
रही
हर
शमा
को
बुझा
के
गया
Shivam Mishra
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शाम
बाँहों
में
उनकी
गुज़र
जाने
दे
वक़्त
अब
मुझको
थोड़ा
ठहर
जाने
दे
चल
चुका
हूँ
बहुत
मंज़िलों
के
लिए
भूल
राहों
के
अब
से
सफ़र
जाने
दे
रेत
साहिल
की
उड़ना
न
चाहे
है
अब
लहर
ख़ुद
को
किनारे
उतर
जाने
दे
है
तमन्ना
यही
फूल
बनकर
अभी
मुझको
राहों
में
उनकी
बिखर
जाने
दे
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Shivam Mishra
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ज़िक्र
तेरा
मुझे
अब
गवारा
नहीं
सामने
अब
तो
आना
दोबारा
नहीं
जो
भी
मेरा
रहा
लुट
चुका
है
यहाँ
अब
लुटेरों
से
मुझको
ख़सारा
नहीं
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Shivam Mishra
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हैं
दरारें
बहुत
दर्द
की
मुझ
में
भी
पर
बुरादा
ख़मोशी
के
डाले
हूँ
मैं
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Shivam Mishra
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