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Hrishita Singh
dil lagii se maine uskaa dil lagaakar
dil lagii se maine uskaa dil lagaakar | दिल - लगी से मैंने उसका दिल लगाकर
- Hrishita Singh
दिल
-
लगी
से
मैंने
उसका
दिल
लगाकर
रो
रही
थी
फिर
मुहब्बत
मुँह
छिपाकर
कैसे
कैसे
लोग
शामिल
बज़्म
में
हैं
और
वो
फिर
चल
रहा
है
सर
उठाकर
मर्ज़
की
इसके
दवा
कोई
नहीं
है
देखे
मैंने
सारे
चारा-गर
बुलाकर
पहले
अपने
दिल
को
खोदा
होगा
उसने
फिर
बनाई
भीत
रब
का
घर
बताकर
- Hrishita Singh
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हम
सेे
मत
पूछो
हाल
ए
दिल
हमारा
अब
अब
हमारी
तबीअत
अच्छी
ख़ासी
है
Hrishita Singh
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रंजिशें
सारी
भूल
जाती
क्या
लौट
मुझ
तक
कभी
वो
आती
क्या
जल
गई
इंतिज़ार
में
इतना
अब
मुलाक़ात
भी
जलाती
क्या
जो
बिछड़
कर
गया
है
मुझ
सेे
तो
उस
को
भी
मेरी
याद
आती
क्या
मेरे
माज़ी
की
इतनी
वहशत
थी
सच
मैं
आख़िर
उसे
बताती
क्या
उसने
थामा
नहीं
था
हाथ
मिरा
आख़िरश
उस
सेे
मैं
छुड़ाती
क्या
वो
नईं
लौटा
वास्ते
मेरे
मैं
भी
उस
सेे
ख़ुशी
जताती
क्या
बे-नियाज़ी
है
उसका
बंदा
ही
तो
सदा
भी
असर
दिखाती
क्या
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Hrishita Singh
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जो
अभी
ख़ुद
कहीं
भी
नहीं
पहुँचे
हैं
आज
वो
रास्ते
मश्वरत
करते
हैं
Hrishita Singh
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कितना
आसान
था
तेरे
बिन
ज़िंदगी
काटना
और
फिर
तेरी
यादों
ने
जीना
भी
मुश्किल
किया
Hrishita Singh
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दोस्ती
में
कुछ
छुपाया
ही
नहीं
मैंने
बस
इक
सच
बताया
ही
नहीं
मैं
उसे
दे
दूँ
विरासत
उम्र
की
मेरे
हिस्से
में
जो
आया
ही
नहीं
तोहमतें
दिल
तोड़ने
के
भी
लगे
दिल
कभी
जिनसे
लगाया
ही
नहीं
उसके
ही
क़दमों
में
मैं
था
गिर
पड़ा
वो
गले
जिसने
लगाया
ही
नहीं
मुद्दतों
जिसके
रहे
है
मुंतज़िर
,
लौट
कर
वो
शख़्स
आया
ही
नहीं
हौसलों
पर
था
यक़ीं
इतना
मुझे
मैंने
क़िस्मत
आज़माया
ही
नहीं
चाहते
थे
बे-वफ़ाई
सीखना
पर
उसे
मुर्शिद
बनाया
ही
नहीं
'मोह'
ने
मेरे
उसे
रक्खा
है
बाँध
हाथ
फिर
मुझ
सेे
छुड़ाया
ही
नहीं
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Hrishita Singh
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