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Himanshu Upadhyay Som
gamon ke paas ja kar baithe hain ham
gamon ke paas ja kar baithe hain ham | ग़मों के पास जा कर बैठे हैं हम
- Himanshu Upadhyay Som
ग़मों
के
पास
जा
कर
बैठे
हैं
हम
ख़ुशी
से
लड़
लड़ाकर
बैठे
हैं
हम
सज़ाओं
पर
सज़ाएँ
मिल
रही
हैं,
न
जाने
क्या
ख़ता
कर
बैठे
हैं
हम
किसी
को
फ़ायदा
हो
इसलिए
बस,
बहुत
नुक़सान
खा
कर
बैठे
हैं
हम
कुछ
इंसानों
को
ख़ुश
करने
की
ख़ातिर,
ख़ुदा
को
ही
ख़फ़ा
कर
बैठे
हैं
हम
मेरे
अश्कों
अभी
थम
जाओ
कुछ
पल,
अभी
तो
मुस्कुरा
कर
बैठे
हैं
हम
कोई
देखे
धुआँ,
आए
बचाने,
यहाँ
हुक्का
जला
कर
बैठे
हैं
हम
किराया
माँगता
है
वो
हरम
का,
जिसे
दिल
में
बसा
कर
बैठे
हैं
हम
ज़रा
सा
प्रेम
पाने
के
लिए
बस,
अना
अपनी
गँवा
कर
बैठे
हैं
हम
वो
माथा
देखकर
लौटे
हैं
वापस,
मकाँ
अंदर
सजा
कर
बैठे
हैं
हम
ये
महफ़िल
"सोम"
ही
लूटेगा
साहब,
सरे
महफ़िल
बता
कर
बैठे
हैं
हम
- Himanshu Upadhyay Som
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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होश
वालों
को
ख़बर
क्या
बे-ख़ुदी
क्या
चीज़
है
इश्क़
कीजे
फिर
समझिए
ज़िंदगी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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ऐ
"दाग़"
बुरा
मान
ना
तू
उसके
कहे
का
माशूक
की
गाली
से
तो
इज़्ज़त
नहीं
जाती
Dagh Dehlvi
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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बे-ख़ुदी
में
ले
लिया
बोसा
ख़ता
कीजे
मुआ'फ़
ये
दिल-ए-बेताब
की
सारी
ख़ता
थी
मैं
न
था
Bahadur Shah Zafar
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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लड़
सको
दुनिया
से
जज़्बों
में
वो
शिद्दत
चाहिए
इश्क़
करने
के
लिए
इतनी
तो
हिम्मत
चाहिए
कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
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Nadeem Shaad
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ख़ूब-सूरत
गुलाब
सी
लड़की
हमने
देखी
है
ख़्वाब
सी
लड़की
बाल
हैं
स्याह
रात
के
जैसे
रुख़
से
है
माहताब
सी
लड़की
राज़
ख़ुद
में
कई
समेटे
हुए
बंद
है
वो
किताब
सी
लड़की
प्यार
ऊँचाइयों
से
है
उसको
उड़ती
फिरती
उक़ाब
सी
लड़की
सब
मुसाफिर
हैं
इक
मरुस्थल
के
और
वो
है
यख़
आब
सी
लड़की
एक
लम्हें
में
हो
गई
गायब
एक
दिलकश
सराब
सी
लड़की
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Himanshu Upadhyay Som
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हो
अकेले
तो
इस
में
ग़म
क्या
है,
दीप
में
रहता
है
गुहर
तन्हा
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Himanshu Upadhyay Som
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एक
ही
दर्द
कब
तलक
पालूंँ
चाहिए
दर्द
अब
नया
मुझको
Himanshu Upadhyay Som
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लोग
जो
दिल
के
पास
होते
हैं
दूर
उनके
निवास
होते
हैं
Himanshu Upadhyay Som
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हरम
दिल
का
न
ख़ाली
था
हमारा
रहा
करता
था
इक
शैदा
हमारा
उसी
के
ख़्वाब
थे
मन्ज़िल
हमारी
उसी
की
नींद
थी
रस्ता
हमारा
तुम्हारे
साथ
जब
ये
हाल
है
तो
तुम्हारे
बाद
क्या
होगा
हमारा
जहाँ
पर
साथ
छोड़ा
हम
सेफ़र
ने
वहीं
पर
रुक
गया
रस्ता
हमारा
ग़ज़ल
कैसे
मुकम्मल
ये
करें
हम
मुआ
मतला
नहीं
बनता
हमारा
किसी
के
दिल
पे
क़ाबू
क्या
करें
हम
हमीं
पर
बस
नहीं
चलता
हमारा
विकारों
को
गिराया
हमने
जब
तब
बहुत
ऊँचा
उठा
पलड़ा
हमारा
गुलों
के
साथ
हम
भी
कुचले
जाते
मगर
काँटों
से
था
रिश्ता
हमारा
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Himanshu Upadhyay Som
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