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Gulzar
sabr har baar ikhtiyaar kiya
sabr har baar ikhtiyaar kiya | सब्र हर बार इख़्तियार किया
- Gulzar
सब्र
हर
बार
इख़्तियार
किया
हम
से
होता
नहीं
हज़ार
किया
आदतन
तुम
ने
कर
दिए
वा'दे
आदतन
हम
ने
ए'तिबार
किया
हम
ने
अक्सर
तुम्हारी
राहों
में
रुक
कर
अपना
ही
इंतिज़ार
किया
फिर
न
माँगेंगे
ज़िंदगी
या-रब
ये
गुनह
हम
ने
एक
बार
किया
- Gulzar
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एक
मुद्दत
से
परिंदे
की
तरह
ये
क़ैद
है
रूह
मेरे
जिस्म
से
'क़ासिद'
रिहा
होती
नहीं
Gurbir Chhaebrra
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बिछड़ते
वक़्त
भी
हिम्मत
नहीं
जुटा
पाया
कभी
भी
उस
को
गले
से
नहीं
लगा
पाया
किसी
को
चाहते
रहने
की
सज़ा
पाई
है
मैं
चार
साल
में
लड़की
नहीं
पटा
पाया
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Shadab Asghar
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निगाह-ए-शोख़
का
क़ैदी
नहीं
है
कौन
यहाँ
किसे
तमन्ना
नहीं
फूल
चूमने
को
मिले
Aks samastipuri
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यूँँ
ज़िंदगी
गुज़ार
रहा
हूँ
तिरे
बग़ैर
जैसे
कोई
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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इश्क़
करना
इक
सज़ा
है
क्या
करें
इश्क़
का
अपना
मज़ा
है
क्या
करें
Syed Naved Imam
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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किसी
के
साए
को
क़ैद
करने
का
एक
तरीक़ा
बता
रहा
हूँ
एक
उसके
आगे
चराग़
रख
दे,
एक
उसके
पीछे
चराग़
रख
दे
मैं
दिल
की
बातों
में
आ
गया
और
उठा
के
ले
आया
उसकी
पायल
दिमाग़
देता
रहा
सदाएँ,
चराग़
रख
दे,
चराग़
रख
दे
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Charagh Sharma
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कोई
समझे
तो
एक
बात
कहूँ
इश्क़
तौफ़ीक़
है
गुनाह
नहीं
Firaq Gorakhpuri
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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कोई
ख़ामोश
ज़ख़्म
लगती
है
ज़िन्दगी
एक
नज़्म
लगती
है
Gulzar
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सहमा
सहमा
डरा
सा
रहता
है
जाने
क्यूँँ
जी
भरा
सा
रहता
है
काई
सी
जम
गई
है
आँखों
पर
सारा
मंज़र
हरा
सा
रहता
है
एक
पल
देख
लूँ
तो
उठता
हूँ
जल
गया
घर
ज़रा
सा
रहता
है
सर
में
जुम्बिश
ख़याल
की
भी
नहीं
ज़ानुओं
पर
धरा
सा
रहता
है
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Gulzar
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हम
ने
अक्सर
तुम्हारी
राहों
में
रुक
कर
अपना
ही
इंतिज़ार
किया
Gulzar
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
अपने
साए
से
चौंक
जाते
हैं
उम्र
गुज़री
है
इस
क़दर
तन्हा
रात
भर
बातें
करते
हैं
तारे
रात
काटे
कोई
किधर
तन्हा
डूबने
वाले
पार
जा
उतरे
नक़्श-ए-पा
अपने
छोड़
कर
तन्हा
दिन
गुज़रता
नहीं
है
लोगों
में
रात
होती
नहीं
बसर
तन्हा
हम
ने
दरवाज़े
तक
तो
देखा
था
फिर
न
जाने
गए
किधर
तन्हा
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Gulzar
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बे-सबब
मुस्कुरा
रहा
है
चाँद
कोई
साज़िश
छुपा
रहा
है
चाँद
Gulzar
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