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Ghulam Abbas
mariyam ne KHvaab dekha
mariyam ne KHvaab dekha | मरियम ने ख़्वाब देखा
- Ghulam Abbas
मरियम
ने
ख़्वाब
देखा
जंगल
में
है
वो
तन्हा
इतने
में
झाड़ियों
से
इक
शे'र
झट
से
निकला
देखी
जो
शक्ल
उस
की
मरियम
पे
ख़ौफ़
छाया
बेचारी
जी
में
सहमी
अब
शे'र
मुझ
पे
झपटा
पर
शे'र
का
तो
उस
दम
कुछ
और
ही
था
नक़्शा
था
वो
बहुत
परेशाँ
सहमा
सा
और
डरा
सा
लटकी
हुई
थी
गर्दन
उतरा
हुआ
था
चेहरा
आँखों
में
उस
की
आँसू
जो
दुम
से
पोंछता
था
मरियम
को
देख
कर
ये
बेहद
हुआ
अचम्भा
ढारस
बंधी
जो
उस
की
मरियम
ने
उस
से
पूछा
ऐ
बादशह
सलामत
है
हाल
आप
का
क्या
तब
उस
ने
झुरझुरी
ली
मरियम
की
सम्त
पल्टा
पहले
दिखाए
पंजे
खोला
फिर
अपना
जबड़ा
कुछ
देर
चुप
रहा
वो
फिर
आह
भर
के
बोला
क्या
पूछती
हो
मुझ
से
ऐ
मेरी
नन्ही
गुड़िया
बिगड़ा
मिरा
मुक़द्दर
फूटा
मिरा
नसीबा
या
बद-दुआ'
है
उस
की
मैं
ने
जिसे
सताया
मुझ
में
रहे
न
कुछ
गुन
अब
दाँत
हैं
न
नाख़ुन
- Ghulam Abbas
ऐसा
लगता
है
कि
तन्हाई
मुझे
छूती
है
उँगलियाँ
कौन
फिरोता
है
मेरे
बालों
में
Ashok Mizaj Badr
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ज़िंदगी
भर
वो
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
एक
तस्वीर
जो
हँसते
हुए
खिंचवाई
थी
Yasir Khan
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लिपट
जाते
हैं
वो
बिजली
के
डर
से
इलाही
ये
घटा
दो
दिन
तो
बरसे
Dagh Dehlvi
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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अपनी
तन्हाई
मिरे
नाम
पे
आबाद
करे
कौन
होगा
जो
मुझे
उस
की
तरह
याद
करे
Parveen Shakir
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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