dekh kar vehshat nigaahon ki zabaan bechain hai | देख कर वहशत निगाहों की ज़बाँ बेचैन है

  - Gautam Rajrishi
देखकरवहशतनिगाहोंकीज़बाँबेचैनहै
फिरसुलगनेकोकोईइकदास्ताँबेचैनहै
कालीरातोंकेसलीक़ेदिनकोक्यूँँभानेलगे
सोचकरगुम-सुमहैधरतीआसमाँबेचैनहै
काग़ज़ोंपरहोगएसारेख़ुलासेहीमगर
कुछतोहैजोहाशियोंकेदरमियाँबेचैनहै
जबसेसाज़िशमेंसमुंदरकीहवाशामिलहुई
कश्तीहैचुप-चापसीऔरबादबाँबेचैनहै
भेदजबसरगोशियोंकाखुलकेआयासामने
शोरवोउट्ठाहैअपनाहुक्मराँबेचैनहै
हिज्रकेमौसमकीकुछमतपूछिएउफ़दास्ताँ
मैंयहाँबेताबहूँतोवोवहाँबेचैनहै
  - Gautam Rajrishi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy