rukh se fitrat ke hijaabaat utha deta hai | रुख़ से फ़ितरत के हिजाबात उठा देता है

  - Gauhar Usmani
रुख़सेफ़ितरतकेहिजाबातउठादेताहै
आइनाटूटकेपत्थरकोसदादेताहै
अज़्मत-ए-अहल-ए-वफ़ाऔरबढ़ादेताहै
ग़म-ए-मुसलसलहोतोफिरग़मभीमज़ादेताहै
दिलधड़कताहैतोपहरोंनहींसोनेदेता
नींदआतीहैतोएहसासजगादेताहै
तुमनेशायदकभीइसबातकोसोचाहोगा
वक़्तहाथोंकीलकीरेंभीमिटादेताहै
जोमिरेक़त्लकेदरपयथाजानेकबसे
आजवोभीमुझेजीनेकीदु'आदेताहै
अपनेकिरदारपेमौजोंकोभीशर्मआतीहै
जबकोईडूबकेसाहिलकापतादेताहै
ग़मकीतौफ़ीक़भीसबकोनहींमिलती'गौहर'
येवोने'मतहैजोमुश्किलसेख़ुदादेताहै
  - Gauhar Usmani
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