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Faizan Faizi
nabi ki pairavi karte rahenge
nabi ki pairavi karte rahenge | नबी की पैरवी करते रहेंगे
- Faizan Faizi
नबी
की
पैरवी
करते
रहेंगे
हम
अपनी
जान
की
बाज़ी
लगा
कर
- Faizan Faizi
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बोसा
लिया
जो
उस
लब-ए-शीरीं
का
मर
गए
दी
जान
हम
ने
चश्मा-ए-आब-ए-हयात
पर
Ameer Minai
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मैंने
अपनी
ग़ज़लें
खारिज
कर
डाली
सोचो
मेरी
जान
तुम्हारा
क्या
होगा
Talib Toofani
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जब
तलक
अनजान
थे
मेहफ़ूज़
थे
जान
लेना
जानलेवा
हो
गया
Vishal Bagh
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एक
नया
'आशिक़
है
उसका,
जान
छिड़कता
है
उसपर
मुझको
डर
है
वो
भी
इक
दिन
मय-ख़ाने
से
निकलेगा
Siddharth Saaz
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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क़ल्ब-ए-हज़ी
मता-ए-जाँ
यूँँ
शाद
कीजिए
कसरत
के
साथ
आप
हमें
याद
कीजिए
दौलत
में
चाहते
हो
इज़ाफा
अगर
शजर
तो
बेकसों
यतीमों
की
इमदाद
कीजिए
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Shajar Abbas
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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बहुत
पहले
से
उन
क़दमों
की
आहट
जान
लेते
हैं
तुझे
ऐ
ज़िंदगी
हम
दूर
से
पहचान
लेते
हैं
Firaq Gorakhpuri
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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सुनो
मजनूंँ
बने
फिरते
रहोगे
यार
कब
तक
तुम
हमारा
मशवरा
है
इश्क़
कोई
दूसरा
कर
लो
Faizan Faizi
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इतनी
तुमने
नेमत
हासिल
कर
ली
है
जैसे
तुमने
जन्नत
हासिल
कर
ली
है
Faizan Faizi
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हम
तुम्हारे
इश्क़
के
इमकान
में
फूल
लेकर
हैं
खड़े
मैदान
में
बात
को
समझो
अनाएँ
छोड़
दो
रूठ
के
बैठो
न
यूँँ
मुल्तान
में
फूल
से
ख़ुश्बू
जुदा
होने
लगी
रख
दिए
थे
आप
जब
गुलदान
में
एक
दिन
देखा
किसी
के
साथ
में
हँस
रही
थी
बैठ
कर
दालान
में
जा
चुके
जो
लोग
फिर
आते
नहीं
है
यही
फ़ितरत
यहाँ
इंसान
में
पूछना
था
क्या
हुआ
था
उस
घड़ी
रो
रहे
थे
लोग
जब
ज़िंदान
में
इक
तरफ़
रख
दो
सभी
रंगीनियांँ
इक
तरफ़
ग़म
को
रखो
मीजा़न
में
दोस्त
मेरे
हैं
सभी
अच्छे
मगर
नाम
उनका
दर्ज
है
शैतान
में
जब
ग़रीबों
की
मदद
करना
कभी
याद
मत
रखना
उसे
एहसान
में
कुछ
नहीं
हासिल
हुआ
मुझ
को
यहाँ
कट
रही
है
उम्र
बस
नुक़सान
में
आसमाँ
पे
जब
बुलाना
हो
ख़ुदा
मौत
से
कहना
मिले
रमज़ान
में
देख
लो
बेहतर
किसी
भी
जान
में
कुछ
नहीं
है
ख़ूबियाँ
फैजा़न
में
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Faizan Faizi
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आप
ही
बस
ख़ास
रहबर
हैं
मिरे
कीजिए
सरकार
अब
नज़रे
करम
है
बड़ी
हसरत
कि
आक़ा
एक
दिन
आप
का
दीदार
हो
देखूंँ
हरम
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Faizan Faizi
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इक
ग़ज़ल
हो
"जौन"
जैसी
भी
यहाँ
का़फ़ीया
जो
हो
मुक़म्मल
ज़ब्त
में
Faizan Faizi
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