patthar se visaal maangti hooñ | पत्थर से विसाल माँगती हूँ

  - Fahmida Riaz
पत्थरसेविसालमाँगतीहूँ
मैंआदमियोंसेकटगईहूँ
शायदपाऊँसुराग़-ए-उल्फ़त
मुट्ठीमेंख़ाक-भररहीहूँ
हरलम्सहैजबतपिशसेआरी
किसआँचसेयूँँपिघलरहीहूँ
वोख़्वाहिश-ए-बोसाभीनहींअब
हैरतसेहोंटकाटतीहूँ
इकतिफ़्लक-ए-जुस्तुजूहूँशायद
मैंअपनेबदनसेखेलतीहूँ
अबतब्अ'किसीपेक्यूँँहोराग़िब
इंसानोंकोबरतचुकीहूँ
  - Fahmida Riaz
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