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Meer Taqi Meer
aag the ibtida-e-ishq men ham
aag the ibtida-e-ishq men ham | आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
- Meer Taqi Meer
आग
थे
इब्तिदा-ए-इश्क़
में
हम
अब
जो
हैं
ख़ाक
इंतिहा
है
ये
- Meer Taqi Meer
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यार
उसके
क़ीमती
तोहफ़े
तो
लाए
थे
बहुत
मैं
बरेली
का
था
मैंने
ला
के
झुमका
दे
दिया
Rudransh Trigunayat
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नहीं
है
लब
पे
दिखावे
का
भी
तबस्सुम
अब
हमें
किसी
ने
मुक़म्मल
उदास
कर
दिया
है
Amaan Haider
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दिया
जला
के
सभी
बाम-ओ-दर
में
रखते
हैं
और
एक
हम
हैं
इसे
रह-गुज़र
में
रखते
हैं
समुंदरों
को
भी
मालूम
है
हमारा
मिज़ाज
कि
हम
तो
पहला
क़दम
ही
भँवर
में
रखते
हैं
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Abrar Kashif
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ये
शुक्र
है
कि
मिरे
पास
तेरा
ग़म
तो
रहा
वगर्ना
ज़िंदगी
भर
को
रुला
दिया
होता
Gulzar
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एक
परिन्दे
का
घर
उजाड़
दिया
किसी
ने
बस
बच्चों
के
इक
दिन
के
झूले
की
ख़ातिर
Pankaj murenvi
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दुनिया
के
भरम
को
कुछ
यूँँ
तोड़
दिया
मैंने
इस
बार
नसीबों
का
रुख़
मोड़
दिया
मैंने
Harsh saxena
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ज़बाने
दाग़
में
मैंने
उसे
लिखी
चिट्ठी
मिज़ाजे
मीर
में
उसने
मुझे
जवाब
दिया
Shadan Ahsan Marehrvi
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कोई
दवा
न
दे
सके
मशवरा-ए-दुआ
दिया
चारागरों
ने
और
भी
दर्द
दिल
का
बढ़ा
दिया
Hafeez Jalandhari
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इलाज
ये
है
कि
मजबूर
कर
दिया
जाऊँ
वगरना
यूँँ
तो
किसी
की
नहीं
सुनी
मैंने
Jaun Elia
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हस्ती
का
नज़ारा
क्या
कहिए
मरता
है
कोई
जीता
है
कोई
जैसे
कि
दिवाली
हो
कि
दिया
जलता
जाए
बुझता
जाए
Nushur Wahidi
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याद
उस
की
इतनी
ख़ूब
नहीं
'मीर'
बाज़
आ
नादान
फिर
वो
जी
से
भुलाया
न
जाएगा
Meer Taqi Meer
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दिल्ली
में
आज
भीक
भी
मिलती
नहीं
उन्हें
था
कल
तलक
दिमाग़
जिन्हें
ताज-ओ-तख़्त
का
Meer Taqi Meer
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सुख़न
मुश्ताक़
है
आलम
हमारा
बहुत
आलम
करेगा
ग़म
हमारा
पढ़ेंगे
शे'र
रो
रो
लोग
बैठे
रहेगा
देर
तक
मातम
हमारा
नहीं
है
मर्जा-ए-आदम
अगर
ख़ाक
किधर
जाता
है
क़द्द-ए-ख़म
हमारा
ज़मीन
ओ
आसमाँ
ज़ेर-ओ-ज़बर
है
नहीं
कम
हश्र
से
ऊधम
हमारा
किसू
के
बाल
दरहम
देखते
'मीर'
हुआ
है
काम-ए-दिल
बरहम
हमारा
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Meer Taqi Meer
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फ़िक्र-ए-ता'मीर'
में
न
रह
मुनइम
ज़िंदगानी
की
कुछ
भी
है
बुनियाद
Meer Taqi Meer
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ये
फ़न्न-ए-इश्क़
है
आवे
उसे
तीनत
में
जिस
की
हो
तू
ज़ाहिद
पीर-ए-नाबालिग़
है
बे-तह
तुझ
को
क्या
आवे
Meer Taqi Meer
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