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Om Shukla
tum bazm men ab kisse sunaati rahna
tum bazm men ab kisse sunaati rahna | तुम बज्म में अब किस्से सुनाती रहना
- Om Shukla
तुम
बज्म
में
अब
किस्से
सुनाती
रहना
मैं
न
रहूँगा
अब
यहाँ,
मुस्कराती
रहना
हुनर
इक
यही
था
मुझे
रोके
रखने
का
फिक्र
भले
न
करना,
पर
दिखाती
रहना
मैं
नहीं
तुम
सेे
आजिज,
तन्हाइयों
से
हूँ
तुम
सेे
कहता
तो
था,
रोज़
आती
रहना
सुन
लो,ये
दुनिया
मेरे
जैसी
है
ही
नहीं
दानिश्ता
ख़ुद
को
इस
सेे
बचाती
रहना
- Om Shukla
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काग़ज़
में
दब
के
मर
गए
कीड़े
किताब
के
दीवाना
बे-पढ़े-लिखे
मशहूर
हो
गया
Bashir Badr
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ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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रदीफ़ो-क़ाफ़िया-ओ-बह'र
का
भी
इल्म
है
लाज़िम
फ़क़त
दिल
टूट
जाने
से
कोई
शाइर
नहीं
बनता
Avtar Singh Jasser
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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बच्चों
के
छोटे
हाथों
को
चाँद
सितारे
छूने
दो
चार
किताबें
पढ़
कर
ये
भी
हम
जैसे
हो
जाएँगे
Nida Fazli
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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अशआ'र
मिरे
यूँँ
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
कुछ
शे'र
फ़क़त
उन
को
सुनाने
के
लिए
हैं
ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
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Jaan Nisar Akhtar
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एक
जमाने
बाद
आई
गाँव
में
बिजली
पहले
उसने
छत
पर
झुमके
टाँगे
थे
Om Shukla
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तुमने
रोका
नहीं
है,
अब
चला
जाऊँगा
ये
धोखा
नहीं
है,
अब
चला
जाऊंगा
तुमने
बताया
नहीं
इश्क़
है
या
नहीं
तुमने
सोचा
नहीं
है,
अब
चला
जाऊँगा
मुहब्बत
भी
न
करूँं
और
ठहर
भी
जाऊँ
ऐसा
होता
नहीं
है,
अब
चला
जाऊँगा
मेरे
जाने
से
कौन
सा
तुम
परेशाँ
होंगे
तू
तो
रोता
नहीं
है,
अब
चला
जाऊँगा
तुम
कब
तक
शरीक-ए-ग़म
रहोगे
'ओम'
तुम
भी
जाओ,
मैं
भी
अब
चला
जाऊँगा
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Om Shukla
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वो
लड़की
बोलती
थी
जब,
चुप
न
होती
थी
मुस्कराती
थी
खुलकर
और
फिर
रोती
थी
मैं
किस
नाते
उसके
लिए
परेशाँ
हूँ
अब
तक
मैं
उसका
कौन
था,
वो
मेरी
कौन
होती
थी
कभी
बारिशों
को
बना
देती
थी
बादल
वो
और
कभी
तो
नाव
में
दरिया
डुबोती
थी
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Om Shukla
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मैने
उसके
ख़्वाब
तक
थे
देख
डाले
उस
से
मेरी
आँख
तक
देखी
न
गई
Om Shukla
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हो
गया
हूँ
शायर
सा,
दिल
में
है
कुछ
ख़ंजर
सा
तुम
अब
अपने
लगते
हो,
कह
लो
इसको
दिलबर
सा
नया
नया
सब
सीख
रहा
हूँ,
पाया
तुमको
रहबर
सा
हम
को
तुम
सेे
इश्क़
हुआ
है
पहन
लो
हमको
जेवर
सा
उतने
ज़रूरी
हो
अब
तुम
शादी
में
ज्यूँ
कोहबर
सा
याद
ऐसे
आते
हो
तुम
ससुराल
में
पीहर
सा
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Om Shukla
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