aks ubhara na tha aaina-e-dil-daari ka | अक्स उभरा न था आईना-ए-दिल-दारी का

  - Ejaz Gul
अक्सउभराथाआईना-ए-दिल-दारीका
हिज्रनेखींचदियादायराज़ंगारीका
नाज़करताथातवालतपेकिवक़्त-ए-रुख़्सत
भेदसाएपेखुलाशामकीअय्यारीका
जिसक़दरख़र्चकिएसाँसहुईअर्ज़ानी
निर्ख़गिरतागयारस्म-ओ-रह-ए-बाज़ारीका
रातनेख़्वाबसेवाबस्तारिफ़ाक़तकेएवज़
रास्ताबंदरखादिनकीनुमूदारीका
ऐसावीरानहुआहैकिख़िज़ाँरोतीहै
कलबहुतशोरथाजिसबाग़मेंगुल-कारीका
बे-सबबजम'अतोकरतानहींतीरतरकश
कुछहदफ़होगाज़मानेकीसितमगारीका
पा-ब-ज़ंजीरकियाथामुझेआसानीने
मरहलाहोसकातयकभीदुश्वारीका
मुतमइनदिलहैअजबभीड़सेग़म-ख़्वारोंकी
सिलसिलातूलपकड़लेयेबीमारीका
  - Ejaz Gul
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