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Dipendra Singh 'Raaz'
vo sadaa jo kaan tak pahunchee nahin
vo sadaa jo kaan tak pahunchee nahin | वो सदा जो कान तक पहुंँची नहीं
- Dipendra Singh 'Raaz'
वो
सदा
जो
कान
तक
पहुंँची
नहीं
शहर
भर
में
ढूंँढते
हैं
हम
उसे
- Dipendra Singh 'Raaz'
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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जो
सुनते
हैं
कि
तिरे
शहर
में
दसहरा
है
हम
अपने
घर
में
दिवाली
सजाने
लगते
हैं
Jamuna Parsad Rahi
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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तुम्हें
मैं
क्या
बताऊँ
इस
शहर
का
हाल
कैसा
है
यहाँ
बारिश
तो
होती
है
मगर
सावन
नहीं
आता
Bhaskar Shukla
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घर
पहुँचता
है
कोई
और
हमारे
जैसा
हम
तेरे
शहरस
जाते
हुए
मर
जाते
हैं
Abbas Tabish
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ये
मयकशों
का
तवाज़ुन
भी
क्या
तवाज़ुन
है
खड़े
भी
रहना
सहूलत
से
लड़खड़ाना
भी
हमारे
शहर
के
लोगों
को
ख़ूब
आता
है
किसी
को
सर
पे
बिठाना
भी
और
गिराना
भी
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Imran Aami
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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ऐसा
बदला
हूँ
तिरे
शहर
का
पानी
पी
कर
झूट
बोलूँ
तो
नदामत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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अश्क,
तन्हाई,
ग़म-ए-हिज्र,
उदासी,
वहशत
ये
सभी
लफ़्ज़
निचोड़े
तो
जा
के
इश्क़
बना
Dipendra Singh 'Raaz'
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उस
सेे
कटता
नहीं
था
फ़ोन
मेरा
ज़िंदगी
कैसे
काटती
होगी
Dipendra Singh 'Raaz'
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उसको
रोते
देखा
तो
महसूस
हुआ
झील
उतर
आई
हो
जैसे
आँखों
में
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुमको
छूने
के
लिए
तो
जानाँ
चाँद
पानी
में
उतर
जाता
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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सुनहरे
ख़्वाबों
से
जिस
मकाँ
को
सजाया
था
हमने
मिल
के
बरसों
हमारे
ख़्वाबों
के
उस
मकाँ
को
लगा
दी
है
आग
ख़ुद
ही
उसने
Dipendra Singh 'Raaz'
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