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Dipendra Singh 'Raaz'
sailaab hi laakar ke ye chhodenge ek din
sailaab hi laakar ke ye chhodenge ek din | सैलाब ही लाकर के ये छोड़ेंगे एक दिन
- Dipendra Singh 'Raaz'
सैलाब
ही
लाकर
के
ये
छोड़ेंगे
एक
दिन
पत्थर
लिए
बैठे
हैं
जो
दरिया
के
सामने
- Dipendra Singh 'Raaz'
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हो
गई
है
पीर
पर्वत
सी
पिघलनी
चाहिए
इस
हिमालय
से
कोई
गंगा
निकलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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मिरे
माँ
बाप
जन्नत
से
नज़र
रखते
हैं
मुझ
पर
अब
मिरे
दिल
में
यतीमों
के
लिए
इक
ख़ास
कोना
है
Amaan Pathan
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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हमने
तुझ
पे
छोड़
दिया
है
कश्ती,
दरिया,
भँवर,
किनारा
Siddharth Saaz
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काश
जन्नत
हमें
मिले
ऐसी
हर
तरफ़
आशिक़ाना
मौसम
हो
Amaan Pathan
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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इक
और
दरिया
का
सामना
था
'मुनीर'
मुझ
को
मैं
एक
दरिया
के
पार
उतरा
तो
मैंने
देखा
Muneer Niyazi
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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करो
हज़ार
मेरे
हक़
में
बद-दुआ
लेकिन
मुझे
वो
याद
न
आए
ये
बद-दुआ
न
करो
Dipendra Singh 'Raaz'
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आओगी
नहीं
तुम
मुझे
ये
इल्म
था
लेकिन
रो-रो
के
पुकारा
तुम्हें
तन्हाई
में
मैंने
Dipendra Singh 'Raaz'
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तेरे
फूलों
को
किताबों
में
छुपा
रक्खा
है
तेरी
तस्वीर
को
सिरहाने
लगा
रक्खा
है
तुझ
सेे
मिलकर
के
गले
रख
दिए
अलमारी
में
तेरी
ख़ुशबू
को
लिबासों
में
दबा
रक्खा
है
उम्र
भर
हाथ
ये
तेरा
नहीं
है
मेरा
मगर
ये
भी
काफ़ी
है
के
कुछ
देर
थमा
रक्खा
है
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Dipendra Singh 'Raaz'
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रख
कर
के
भूल
जाता
था
हर
शय
को
मैं
कभी
लेकिन
तुम्हारा
ग़म
कभी
भूले
नहीं
भुला
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुम्हें
खोकर
के
ये
जाना
है
मैंने
नशा
किस
काम
आता
है
जहाँँ
में
Dipendra Singh 'Raaz'
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