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Dipendra Singh 'Raaz'
maine phir hañs ke use kah diya allah haafiz
maine phir hañs ke use kah diya allah haafiz | मैंने फिर हँस के उसे कह दिया अल्लाह हाफ़िज़
- Dipendra Singh 'Raaz'
मैंने
फिर
हँस
के
उसे
कह
दिया
अल्लाह
हाफ़िज़
बारहा
देख
रही
थी
वो
घड़ी
की
जानिब
- Dipendra Singh 'Raaz'
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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गुज़िश्ता
साल
कोई
मस्लहत
रही
होगी
गुज़िश्ता
साल
के
सुख
अब
के
साल
दे
मौला
Liyaqat Ali Aasim
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दु'आ
को
हाथ
उठाते
हुए
लरज़ता
हूँ
कभी
दु'आ
नहीं
माँगी
थी
माँ
के
होते
हुए
Iftikhar Arif
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उम्र
भर
जिसने
न
माँगा
हो
ख़ुदास
कुछ
भी
उस
ने
बस
तुम
से
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
है
Shadab Asghar
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मुत्तकी
हो
गया
ख़ौफ़-ए-बीवी
से
मैं
अब
इबादत
का
सौदा
मेरे
सर
में
है
मैंने
दाढ़ी
बढ़ाई
तो
कहने
लगी
अब
कमीना
ये
हूरों
के
चक्कर
में
है
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Paplu Lucknawi
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दुनिया
कुछ
देरी
से
सजदा
करती
है
जोगी
पहले
दिन
से
जोगी
होता
हैं
Vishal Bagh
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उठते
नहीं
हैं
अब
तो
दु'आ
के
लिए
भी
हाथ
किस
दर्जा
ना-उमीद
हैं
परवरदिगार
से
Akhtar Shirani
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ये
इम्तियाज़
ज़रूरी
है
अब
इबादत
में
वही
दु'आ
जो
नज़र
कर
रही
है
लब
भी
करें
Abhishek shukla
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अल्लाह
अल्लाह
हुस्न
की
ये
पर्दा-दारी
देखिए
भेद
जिस
ने
खोलना
चाहा
वो
दीवाना
हुआ
Arzoo Lakhnavi
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उस
दुश्मन-ए-वफ़ा
को
दु'आ
दे
रहा
हूँ
मैं
मेरा
न
हो
सका
वो
किसी
का
तो
हो
गया
Hafeez Banarasi
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काम
आती
नहीं
दवा
कोई
रोज़
देता
है
बद्दुआ
कोई
ख़ाली
कमरे
में
ऐसे
लगता
है
दे
रहा
है
मुझे
सदा
कोई
कौन
है
उस
तरफ़
कोई
भी
नहीं
मुझको
ऐसा
लगा
कि
था
कोई
मुझको
डर
है
न
पूछ
ले
मुझ
सेे
है
भला
शहर
में
तेरा
कोई
कॉल
करने
का
उसको
जब
सोचूंँ
याद
आता
है
वास्ता
कोई
दिल
मकाँँ
है
ये
जैसे
मुफ़्लिस
का
तोड़
जाता
है
बारहा
कोई
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Dipendra Singh 'Raaz'
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दुखी
रहने
की
आदत
यूँंँ
बना
ली
है
कि
अब
कोई
ख़ुशी
का
ज़िक्र
भी
कर
दे
तो
फिर
तकलीफ़
होती
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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जब
किया
इज़हार
तो
हंँस
कर
मुझे
कहने
लगी
प्यार
से
दो
बात
करना
प्यार
हो
जाता
है
क्या
Dipendra Singh 'Raaz'
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ये
नहीं
है
कि
उस
सेे
प्यार
नहीं
हाँ
पर
अब
उसका
इंतिज़ार
नहीं
बारिशें
हैं
फ़ुज़ूल
उनके
लिए
जिनके
पहलू
में
जिनका
यार
नहीं
याद
करने
का
हक़
है
मुझको
फ़क़त
कॉल
करने
का
इख़्तियार
नहीं
ज़िंदगी
बोलता
हूँ
तुमको,
पर
ज़िंदगी
का
कुछ
ऐतबार
नहीं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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चल
रहे
दफ़्तर
हैं
अफ़सर
सो
रहे
हैं
खिड़कियाँ
हैं
जागती
दर
सो
रहे
हैं
सोख
लेते
हैं
ये
तकिए
आँसुओं
को
मुतमइन
होके
सो
बिस्तर
सो
रहे
हैं
ऐन
मुमकिन
है
कोई
तूफ़ान
आए
एक
अरसे
से
समुंदर
सो
रहे
हैं
ये
नहीं
है
वक़्त
हमला
बोलने
का
देखिए
उस
पार
लश्कर
सो
रहे
हैं
कुछ
नहीं
मालूम
कब
उठ
जाए
ये
फिर
दर्द
जो
सीने
के
अंदर
सो
रहे
हैं
ख़्वाब
में
भी
अश्क
ही
आएँगे
अब
तो
मीर
का
दीवान
पढ़
कर
सो
रहे
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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