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Dipendra Singh 'Raaz'
hamko tanhaaii muyassar hui to ilm hua
hamko tanhaaii muyassar hui to ilm hua | हमको तन्हाई मुयस्सर हुई तो इल्म हुआ
- Dipendra Singh 'Raaz'
हमको
तन्हाई
मुयस्सर
हुई
तो
इल्म
हुआ
ये
सुकूँ
वो
है
जो
बाहों
में
नहीं
मिलता
है
- Dipendra Singh 'Raaz'
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बे-गिनती
बोसे
लेंगे
रुख़-ए-दिल-पसंद
के
आशिक़
तिरे
पढ़े
नहीं
इल्म-ए-हिसाब
को
Haidar Ali Aatish
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हमारा
इल्म
बूढ़ा
हो
रहा
है
किताबें
धूल
खाती
जा
रही
हैं
Kaif Uddin Khan
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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वही
लिखने
पढ़ने
का
शौक़
था,
वही
लिखने
पढ़ने
का
शौक़
है
तेरा
नाम
लिखना
किताब
पर,
तेरा
नाम
पढ़ना
किताब
में
Bashir Badr
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अशआ'र
मिरे
यूँँ
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
कुछ
शे'र
फ़क़त
उन
को
सुनाने
के
लिए
हैं
ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
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Jaan Nisar Akhtar
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अब
मज़ीद
उस
सेे
ये
रिश्ता
नहीं
रक्खा
जाता
जिस
सेे
इक
शख़्स
का
पर्दा
नहीं
रक्खा
जाता
पढ़ने
जाता
हूँ
तो
तस्में
नहीं
बाँधे
जाते
घर
पलटता
हूँ
तो
बस्ता
नहीं
रक्खा
जाता
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Tehzeeb Hafi
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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इल्म
जब
होगा
किधर
जाना
है
हाए
तब
तक
तो
गुज़र
जाना
है
Madan Mohan Danish
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इक
और
किताब
ख़त्म
की
फिर
उस
को
फाड़
कर
काग़ज़
का
इक
जहाज़
बनाया
ख़ुशी
हुई
Ameer Imam
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तुम
को
तो
बस
हुस्न
के
नंबर
मिलते
हैं
उसका
सोचो
जिसको
पढ़ना
पड़ता
है
Kafeel Rana
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छुपा
रहा
हूँ
मेरे
अश्क
आह
करते
हुए
जब
उसको
देख
रहा
हूँ
निकाह
करते
हुए
शब-ए-फ़िराक़
हुआ
था
जो
शे'र
मैंने
पढ़ा
तो
लोग
रोने
लगे
वाह
वाह
करते
हुए
यहाँ
तो
आँख
पे
पट्टी
बँधी
है
सब
के
मगर
ख़ुदा
तो
देख
रहा
है
गुनाह
करते
हुए
कसूरवार
अदालत
में
कर
दिया
उसने
सवाल
पर
मेरी
जानिब
निगाह
करते
हुए
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Dipendra Singh 'Raaz'
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लम्स
दिल
पर
है
तुम्हारा
मेरे
मैंने
आँखों
से
छुआ
है
तुमको
Dipendra Singh 'Raaz'
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चल
रहे
दफ़्तर
हैं
अफ़सर
सो
रहे
हैं
खिड़कियाँ
हैं
जागती
दर
सो
रहे
हैं
सोख
लेते
हैं
ये
तकिए
आँसुओं
को
मुतमइन
होके
सो
बिस्तर
सो
रहे
हैं
ऐन
मुमकिन
है
कोई
तूफ़ान
आए
एक
अरसे
से
समुंदर
सो
रहे
हैं
ये
नहीं
है
वक़्त
हमला
बोलने
का
देखिए
उस
पार
लश्कर
सो
रहे
हैं
कुछ
नहीं
मालूम
कब
उठ
जाए
ये
फिर
दर्द
जो
सीने
के
अंदर
सो
रहे
हैं
ख़्वाब
में
भी
अश्क
ही
आएँगे
अब
तो
मीर
का
दीवान
पढ़
कर
सो
रहे
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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आओगी
नहीं
तुम
मुझे
ये
इल्म
था
लेकिन
रो-रो
के
पुकारा
तुम्हें
तन्हाई
में
मैंने
Dipendra Singh 'Raaz'
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जल
कर
के
राख
हो
गए
हैं
ख़्वाब
सब
मेरे
आँखों
में
रतजगों
के
सिवा
कुछ
नहीं
बचा
Dipendra Singh 'Raaz'
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