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Dipendra Singh 'Raaz'
hijr ke mausam men aur kya kaam hai
hijr ke mausam men aur kya kaam hai | हिज्र के मौसम में और क्या काम है
- Dipendra Singh 'Raaz'
हिज्र
के
मौसम
में
और
क्या
काम
है
रोज़
पलकों
को
भिगोने
के
सिवा
पूछ
बैठी
एक
दिन
फिर
वो
मुझे
और
कुछ
आता
है
रोने
के
सिवा
- Dipendra Singh 'Raaz'
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हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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तुम्हारा
हिज्र
मना
लूँ
अगर
इजाज़त
हो
मैं
दिल
किसी
से
लगा
लूँ
अगर
इजाज़त
हो
Jaun Elia
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उस
हिज्र
पे
तोहमत
कि
जिसे
वस्ल
की
ज़िद
हो
उस
दर्द
पे
ला'नत
की
जो
अशआ'र
में
आ
जाए
Vipul Kumar
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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बिछड़
जाएँगे
हम
दोनों
ज़मीं
पर
ये
उस
ने
आसमाँ
पर
लिख
दिया
है
Siraj Faisal Khan
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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काट
पाऊँगा
मैं
कैसे
ज़िंदगी
तेरे
बग़ैर
तीन
दिन
का
हिज्र
मुझ
को
लग
रहा
है
तीन
साल
Afzal Ali Afzal
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सुब्ह
तक
हिज्र
में
क्या
जानिए
क्या
होता
है
शाम
ही
से
मिरे
क़ाबू
में
नहीं
दिल
मेरा
Jigar Moradabadi
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मिरी
ज़िंदगी
तो
गुज़री
तिरे
हिज्र
के
सहारे
मिरी
मौत
को
भी
प्यारे
कोई
चाहिए
बहाना
Jigar Moradabadi
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कभी
न
लौट
के
आया
वो
शख़्स,
कहता
था
ज़रा
सा
हिज्र
है
बस
सरसरी
बिछड़ना
है
Subhan Asad
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मुझको
छोड़
के
ख़ुश
हो
गर
तुम
ग़म
क्या
है
फिर
ग़म
का
मेरे
Dipendra Singh 'Raaz'
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रहने
लगे
उदास
तो
लिखने
लगे
थे
शे'र
सूखे
हुए
थे
पेड़
सो
कश्ती
बना
दिया
दिन
भर
लगा
के
उसको
बनाया
था
इक
मकाँँ
साहिल
की
एक
मौज़
ने
मिट्टी
बना
दिया
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Dipendra Singh 'Raaz'
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चल
रहे
दफ़्तर
हैं
अफ़सर
सो
रहे
हैं
खिड़कियाँ
हैं
जागती
दर
सो
रहे
हैं
सोख
लेते
हैं
ये
तकिए
आँसुओं
को
मुतमइन
होके
सो
बिस्तर
सो
रहे
हैं
ऐन
मुमकिन
है
कोई
तूफ़ान
आए
एक
अरसे
से
समुंदर
सो
रहे
हैं
ये
नहीं
है
वक़्त
हमला
बोलने
का
देखिए
उस
पार
लश्कर
सो
रहे
हैं
कुछ
नहीं
मालूम
कब
उठ
जाए
ये
फिर
दर्द
जो
सीने
के
अंदर
सो
रहे
हैं
ख़्वाब
में
भी
अश्क
ही
आएँगे
अब
तो
मीर
का
दीवान
पढ़
कर
सो
रहे
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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कभी
शायद
किसी
ने
ख़्वाब
में
सोचा
न
होगा
किसी
का
एक
जुमला
जान
ले
लेगा
किसी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुम्हारे
इश्क़
से
मुझको
अता
हुए
थे
जो
तमाम
ज़ख़्म
वो
मैंने
सदा
हरे
रक्खे
Dipendra Singh 'Raaz'
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