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Dipendra Singh 'Raaz'
bose hain kisi aur ke hi haq men ab uske
bose hain kisi aur ke hi haq men ab uske | बोसे हैं किसी और के ही हक़ में अब उसके
- Dipendra Singh 'Raaz'
बोसे
हैं
किसी
और
के
ही
हक़
में
अब
उसके
बाँहें
हैं
किसी
और
को
अब
उसकी
मुयस्सर
- Dipendra Singh 'Raaz'
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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तू
मुझे
छोड़
के
ठुकरा
के
भी
जा
सकती
है
तेरे
हाथों
में
मेरे
हाथ
हैं
ज़ंजीर
नहीं
Sahir Ludhianvi
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शब
के
सन्नाटे
में
ये
किस
का
लहू
गाता
है
सरहद-ए-दर्द
से
ये
किस
की
सदा
आती
है
Ali Sardar Jafri
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लहू
वतन
के
शहीदों
का
रंग
लाया
है
उछल
रहा
है
ज़माने
में
नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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बाज़
बनना
है
तो
फिर
कद
भूल
जा
आँख
में
रख
लक्ष्य
और
हद
भूल
जा
किसलिए
डरता
है
दीवारों
से
तू
आ
समाँँ
को
देख
सरहद
भूल
जा
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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हर
गाम
तेरे
इश्क़
का
इकरार
है
मैं
हूँ
ज़ंजीर
है
ज़ंजीर
की
झनकार
है
मैं
हूँ
ऐ
ज़ीस्त
जो
सब
सेे
बड़ी
फ़नकार
है
तू
है
और
तुझ
सेे
बड़ा
वो
जो
अदाकार
है
मैं
हूँ
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Obaid Azam Azmi
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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हम
देख
कर
के
डर
रहे
थे
धुँद
दूर
से
चलने
लगे
तो
आप
ही
रस्ता
निकल
गया
हम
ढूंँढने
लगे
थे
मसाइल
के
हल
मगर
तब
तक
हमारे
बीच
से
रिश्ता
निकल
गया
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Dipendra Singh 'Raaz'
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एक
था
वक़्त
जब
आँखों
में
था
ख़्वाबों
का
हुजूम
अब
तो
इक
ख़्वाब
टटोले
से
नहीं
मिलता
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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लगती
है
बहुत
ख़ाली
से
अब
ये
मेरी
आँखें
काजल
से
कहो
कोई
मेरी
आँख
में
आए
Dipendra Singh 'Raaz'
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चल
रहे
दफ़्तर
हैं
अफ़सर
सो
रहे
हैं
खिड़कियाँ
हैं
जागती
दर
सो
रहे
हैं
सोख
लेते
हैं
ये
तकिए
आँसुओं
को
मुतमइन
होके
सो
बिस्तर
सो
रहे
हैं
ऐन
मुमकिन
है
कोई
तूफ़ान
आए
एक
अरसे
से
समुंदर
सो
रहे
हैं
ये
नहीं
है
वक़्त
हमला
बोलने
का
देखिए
उस
पार
लश्कर
सो
रहे
हैं
कुछ
नहीं
मालूम
कब
उठ
जाए
ये
फिर
दर्द
जो
सीने
के
अंदर
सो
रहे
हैं
ख़्वाब
में
भी
अश्क
ही
आएँगे
अब
तो
मीर
का
दीवान
पढ़
कर
सो
रहे
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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आए
सही
वो
आए
भले
देर
से
यहाँ
कितनी
तो
देर
लगती
है
अजमेर
से
यहाँ
Dipendra Singh 'Raaz'
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