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Deepika Jain
bankar hakeem aayen jo
bankar hakeem aayen jo | बनकर हकीम आएँ जो
- Deepika Jain
बनकर
हकीम
आएँ
जो
ज़ख़्मों
को
और
मसल
गए
- Deepika Jain
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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क्यूँ
डरें
ज़िन्दगी
में
क्या
होगा
कुछ
न
होगा
तो
तजरबा
होगा
Javed Akhtar
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मैंने
चाहा
तेरे
जाने
में
न
कुछ
कमी
रहे
कोन
चाहे
उम्र
भर
ही
आँखों
में
नमी
रहे
Yogamber Agri
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एक
रिश्ता
जिसे
मैं
दे
न
सका
कोई
नाम
एक
रिश्ता
जिसे
ता-उम्र
निभाए
रक्खा
Aks samastipuri
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अब
तो
ख़ुद
अपने
ख़ून
ने
भी
साफ़
कह
दिया
मैं
आपका
रहूॅंगा
मगर
उम्र
भर
नहीं
Aalok Shrivastav
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हमारी
उम्र
के
लड़के
ग़ज़ल
तो
लिख
रहे
हैं
पर
ये
इतना
दर्द
लेके
जी
रहे
हैं
ठीक
थोड़ी
है
Ramesh Singh
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जहाँ
पे
मैंने
तुझे
पहली
बार
देखा
था
वहाँ
पे
फूल
रखे
मैंने,
उम्र
भर
रक्खे
Aslam Rashid
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उम्र
का
एक
और
साल
गया
वक़्त
फिर
हम
पे
ख़ाक
डाल
गया
Shakeel Jamali
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ग़ज़ल
में
'दीप'
ने
ख़ुद
को
समेटा
मगर
हर्फ़ों
में
याँ
बिखरा
है
कोई
Deepika Jain
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दिल
पे,
ये
दुनिया
जब
निशान
करे
दर्द
ग़ज़लों
में
तब
बयान
करे
बेच
पाता
मैं
अपने
भी
ग़म
को
गर
ग़मों
की
कोई
दुकान
करे
मतलबी
लोग
सोचते
हैं
यही
सब
उन्हीं
का
महज़
बखान
करे
देखते
रह
गए
अमीर
सभी
कोई
मुफलिस
यहाँँ
पे
दान
करे
मांँ
नहीं
"दीप"
दुनिया
में
तेरे
पास
दूर
तू
कैसे
फिर
थकान
करे
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Deepika Jain
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दोस्त
आँसू
पोछकर
भी
सच्चा
लगता
क्यूँँंँ
नहीं
कुछ
ग़लत
देखा
तू
ने
तो
मुझ
सेे
पूछा
क्यूँँंँ
नहीं
Deepika Jain
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माँ
नहीं
"दीप"
दुनिया
में
तेरे
पास
दूर
तू
कैसे
फिर
थकान
करे
Deepika Jain
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हर
तरफ़
से
पहरा
ख़ामोशी
का
हटता
क्यूँँंँ
नहीं
मुझ
सेे
थी
नाराज़गी
तो
मुझ
पे
बरसा
क्यूँँंँ
नहीं
Deepika Jain
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