jab aadmi muddaa-e-haq hai to kya kahein muddaa kahaan hai | जब आदमी मुद्दआ-ए-हक़ है तो क्या कहें मुद्दआ' कहाँ है

  - Darshan Singh
जबआदमीमुद्दआ-ए-हक़हैतोक्याकहेंमुद्दआ'कहाँहै
ख़ुदाहैख़ुदजिसकेदिलमेंपिन्हाँवोढूँढताहैख़ुदाकहाँहै
येबज़्म-ए-यारान-ए-ख़ुद-नुमाहैकरख़ुलूस-ए-वफ़ाकीबातें
सभीतोहैंमुद्दई'वफ़ाकेयहाँकोईबे-वफ़ाकहाँहै
तमामपरतवहैंअक्स-ए-परतवतमामजल्वेहैंअक्स-ए-जल्वा
कहाँसेलाऊँमिसाल-ए-सूरतकिआपसादूसराकहाँहै
निहाँहैंतकमील-ए-ख़ुद-शनासीमेंजल्वा-हा-ए-ख़ुदा-शनासी
जोअपनीहस्तीसेबे-ख़बरहैवोआपसेआश्नाकहाँहै
पड़ीहैसुनसानदिलकीवादीअकेलामहव-ए-तलाशहूँमैं
किइश्क़केराह-रौकिधरहैंवफ़ाओंकाक़ाफ़िलाकहाँहै
जिन्हेंवसाएलपेहैभरोसायेबातउनकोबतादेकोई
बचालेकश्तीकोजोभँवरसेख़ुदाहैवोनाख़ुदाकहाँहै
पड़ाहीरहनेदोसर-ब-सज्दाछूटनेदोयेआस्ताना
कि'दर्शन'-ए-ख़स्ताकाठिकानातुम्हारेदरकेसिवाकहाँहै
  - Darshan Singh
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