gulon pe khaak-e-mehan ke siva kuchh aur nahin | गुलों पे ख़ाक-ए-मेहन के सिवा कुछ और नहीं

  - Darshan Singh
गुलोंपेख़ाक-ए-मेहनकेसिवाकुछऔरनहीं
चमनमेंयाद-ए-चमनकेसिवाकुछऔरनहीं
कहाँकीमंज़िल-ए-रंगींसहरतोहोनेदो
हमारेख़्वाबथकनकेसिवाकुछऔरनहीं
येशाम-ए-ग़ुर्बत-ए-दिलहैयहाँचराग़कहाँ
ख़याल-ए-सुब्ह-ए-वतनकेसिवाकुछऔरनहीं
निगाह-ए-शौक़-ए-मुसलसलउसीकोछेड़ेजा
जबींपेजिसकीशिकनकेसिवाकुछऔरनहीं
दयार-ए-इश्क़मेंतुमक्यूँँखड़ेहोअहल-ए-हवस
यहाँतोदार-ओ-रसनकेसिवाकुछऔरनहीं
सवाद-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँहैतोहोहमेंक्याग़म
नज़रमेंसुब्ह-ए-चमनकेसिवाकुछऔरनहीं
करेतलाशजुनूँज़ुल्मत-ए-ख़िरदसेकहो
जुनूँकिरनहैकिरनकेसिवाकुछऔरनहीं
हमारीनग़्मा-सराईकेवास्ते'दर्शन'
हवा-ए-गंग-ओ-जमनकेसिवाकुछऔरनहीं
  - Darshan Singh
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