chashm-e-beena ho to qaid-e-haram-o-toor nahin | चश्म-ए-बीना हो तो क़ैद-ए-हरम-ओ-तूर नहीं

  - Darshan Singh
चश्म-ए-बीनाहोतोक़ैद-ए-हरम-ओ-तूरनहीं
देखनेवालीनिगाहोंसेवोमस्तूरनहीं
कौनसाघरहैजवाँजल्वोंसेपुर-नूरनहीं
इकमिरेदिलकीहीदुनियाहैजोमा'मूरनहीं
अपनीहिम्मतहीसेपहुँचूँगासर-ए-मंज़िल-ए-शौक़
लूँसहारामैंकिसीकामुझेमंज़ूरनहीं
ग़म-ए-जानाँकोभुलादूँकरूँँदोस्तकोयाद
इतनामैंग़म-ए-दौराँअभीमजबूरनहीं
येमोहब्बतकीहैक़ीमतयेमोहब्बतकासिला
किहमारेहीलिएइश्क़कादस्तूरनहीं
दोनोंआलमकोडुबोदेजोमय-ओ-मीनामें
चश्म-ए-साक़ीकेसिवाऔरकामक़्दूरनहीं
मुस्कुरादोतोमिराग़ुंचा-दिलखिलजाए
दिलकभीखिलसकेऐसाभीरंजूरनहीं
तुमनहींपासमगरसाथहैयादोंकाहुजूम
मैंअकेलानहींबेकसनहींमहजूरनहीं
आजकुछशामसेतारीकहैदिलकीमहफ़िल
तुमनहींहोतोवोरौनक़नहींवोनूरनहीं
मुझमेंहिम्मतहैकिमैंराज़कोइफ़्शाकरूँँ
येमिराज़र्फ़हैयेशेवा-ए-मंसूरनहीं
करसकेगाजुदाफ़ासला-ए-वक़्त-ओ-मकाँ
दूरनज़रोंसेसहीदिलसेमगरदूरनहीं
मेरीतक़दीरमें'दर्शन'हैंकिसीकेजल्वे
शुक्रसदशुक्रकिदुनियामिरीबे-नूरनहीं
  - Darshan Singh
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