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Brajnabh Pandey
har roz ik do baat aaKHir men nikal hi jaati hai
har roz ik do baat aaKHir men nikal hi jaati hai | हर रोज़ इक दो बात आख़िर में निकल ही जाती है
- Brajnabh Pandey
हर
रोज़
इक
दो
बात
आख़िर
में
निकल
ही
जाती
है
और
फिर
उदासी
भी
यूँँ
चेहरे
को
बदल
के
आती
है
रहता
हूँ
अक्सर
दुख
में
अब
मैं
मेरी
बीती
बातों
से
इक
लड़की
जो
जाँ
मेरी
है
यारो
बहुत
तड़पाती
है
- Brajnabh Pandey
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तुम्हारे
बाद
इस
आँगन
में
फूल
खिलने
पर
ख़ुशी
हुई
भी
तो
ये
दुख
हुआ
कि
दें
किसको
Mohit Dixit
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मैं
शा'इर
हूँ
मोहब्बत
का
मिरे
दुख
भी
रसीले
हैं
Farhat Abbas Shah
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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ग़म-ए-दुनिया
भी
ग़म-ए-यार
में
शामिल
कर
लो
नश्शा
बढ़ता
है
शराबें
जो
शराबों
में
मिलें
Ahmad Faraz
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हम
आज
राह-ए-तमन्ना
में
जी
को
हार
आए
न
दर्द-ओ-ग़म
का
भरोसा
रहा
न
दुनिया
का
Waheed Quraishi
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खुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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चारासाज़ो
मिरा
इलाज
करो
आज
कुछ
दर्द
में
कमी
सी
है
Azhar Nawaz
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जान
क्यूँँ
तू
मुझको
घाइल
कर
रहा
है
दिल
भी
मुझ
सेे
यार
दंगल
कर
रहा
है
क्या
बताऊँ
खलबली
दिल
में
मची
है
मुझको
तेरा
हुस्न
पागल
कर
रहा
है
ज़िंदगी
मेरी
तो
बंजर
हो
गई
है
पर
ये
तेरा
प्यार
बादल
कर
रहा
है
दश्त
का
माहौल
सा
था
तू
जो
बिछड़ा
फिर
तू
आ
कर
मुझ
को
जंगल
कर
रहा
है
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Brajnabh Pandey
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कभी
तो
यार
मेरी
ग़ज़लों
का
पूछा
करो
मतलब
मुझे
मालूम
है
जाँ
तुम
ग़ज़ल
कितनी
समझती
हो
Brajnabh Pandey
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वो
तेरे
ख़ातिर
जो
सपना
देखा
था
'ब्रज'
अब
वो
कोई
और
पूरा
कर
रहा
है
Brajnabh Pandey
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मेरी
उदासी
को
समझने
वाले
बोल
क्या
अब
नहीं
होता
ज़रा
भी
मैं
उदास
Brajnabh Pandey
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उस
रात
से
जाने
हुआ
क्या
है
मुझे
अब
दर्द
भी
हँसना
सिखाता
है
मुझे
जब
भी
ख़ुशी
की
ओर
रखता
हूँ
क़दम
पीछे
से
कोई
खींच
लाता
है
मुझे
उसके
सिवा
कुछ
भी
न
देखूँ
और
करूँँ
ऐसी
हिदायत
कोई
देता
है
मुझे
अपना
बदन
भी
है
रुकावट
लगता
जब
आग़ोश
में
अपनी
वो
भरता
है
मुझे
अपने
बदन
से
ही
जलन
होती
है
अब
ऐसी
मुहब्बत
कोई
करता
है
मुझे
वो
हुक्म
यारों
मुझको
ऐसे
देता
है
जैसे
कोई
एहसान
करता
है
मुझे
उसको
ये
फ़न
मैंने
सिखाया
मैंने
'ब्रज'
वो
सौ
तरह
से
मार
सकता
है
मुझे
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Brajnabh Pandey
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