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Bhuwan Singh
usii ki yaad men hi kyuuñ mire dil ka guzaara ho
usii ki yaad men hi kyuuñ mire dil ka guzaara ho | उसी की याद में ही क्यूँ मिरे दिल का गुज़ारा हो
- Bhuwan Singh
उसी
की
याद
में
ही
क्यूँ
मिरे
दिल
का
गुज़ारा
हो
मोहब्बत
प्यार
जो
भी
हो
नया
कोई
इशारा
हो
इजाज़त
है
तुम्हें
कह
दो
तुम्हें
मुझ
सेे
मोहब्बत
है
यही
तो
चाहता
हूँ
मैं
मोहब्बत
फिर
दुबारा
हो
- Bhuwan Singh
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मैं
भी
इक
शख़्स
पे
इक
शर्त
लगा
बैठा
था
तुम
भी
इक
रोज़
इसी
खेल
में
हारोगे
मुझे
ईद
के
दिन
की
तरह
तुमने
मुझे
ज़ाया'
किया
मैं
समझता
था
मुहब्बत
से
गुज़ारोगे
मुझे
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Ali Zaryoun
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मैं
चाहता
हूँ
कि
तुम
ही
मुझे
इजाज़त
दो
तुम्हारी
तरह
से
कोई
गले
लगाए
मुझे
Bashir Badr
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इतनी
शोहरत
तो
मेरी
आज
भी
इस
शहर
में
है
एक
पत्ता
न
हिले
मेरी
इजाज़त
के
बग़ैर
Mukesh Jha
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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रुख़्सार
का
दे
शर्त
नहीं
बोसा-ए-लब
से
जो
जी
में
तिरे
आए
सो
दे
यार
मगर
दे
Maatam Fazl Mohammad
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न
हो
बरहम
जो
बोसा
बे-इजाज़त
ले
लिया
मैं
ने
चलो
जाने
दो
बेताबी
में
ऐसा
हो
ही
जाता
है
Jalal Lakhnavi
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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तोड़
कर
तुझको
भला
मेरा
भी
क्या
बन
जाता
उल्टा
मैं
ख़ुद
की
मुहब्बत
प
सज़ा
बन
जाता
जितनी
कोशिश
है
तिरी
एक
तवज्जोह
के
लिए
उस
सेे
कम
में
तो
मैं
दुनिया
का
ख़ुदा
बन
जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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ऐसी
सर्दी
में
शर्त
चादर
है
ओढ़ने
की
हो
या
बिछौने
की
Paras Mazari
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कुछ
तो
मिल
जाए
लब-ए-शीरीं
से
ज़हर
खाने
की
इजाज़त
ही
सही
Arzoo Lakhnavi
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कोई
तरीक़ा
ही
नहीं
इसको
बचाने
के
लिए
दिल
तो
बना
ही
है
मियाँ
बस
चोट
खाने
के
लिए
उम्मीद
मत
रखना
कि
अब
वादे
निभाएगा
कोई
हर
शख़्स
वादे
करता
है
अब
तोड़
जाने
के
लिए
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Bhuwan Singh
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वो
एक
लड़की
मुझे
लोरियाँ
सुनाती
थी
मुझे
भी
उस
की
ही
बाहों
में
नींद
आती
थी
मैं
अर्सों
पहले
बस
उस
के
लिए
धड़कता
था
वो
अर्सों
पहले
मुझे
अपना
दिल
बुलाती
थी
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Bhuwan Singh
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हमको
चढ़ा
है
शौक़
उसी
एक
क़िस्म
का
करने
लगे
हैं
अब
तो
नशा
हम
भी
जिस्म
का
अब
हम
भी
आने
लग
गए
हैं
उसके
काबू
में
ऐसा
मतीन
जाल
है
उसके
तिलिस्म
का
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Bhuwan Singh
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कोई
सज़ा
सुना
ही
न
पाए
मेरे
लिए
कानून
ऐसा
कोई
बनाए
मेरे
लिए
Bhuwan Singh
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अपना
ही
घर
समझता
रहा
उस
मकान
को
परवाह
तारे
की
न
थी
पर
आसमान
को
बर्बाद
करके
उम्र
मिरी
उसने
ये
कहा
बस
तुम
नहीं
पसंद
मिरे
ख़ानदान
को
वो
सारे
फूल
तोड़
गया
उसको
कुछ
नहीं
सबने
बुरा
कहा
भी
तो
बस
बाग़बान
को
उसको
पता
था
मुझको
मोहब्बत
है
इसलिए
वो
छेड़ता
था
ज़ख़्म
के
हर
इक
निशान
को
वो
कारोबार
करता
है
अब
रोज़
इश्क़
का
अब
रोज़
वो
सजाता
है
अपनी
दुकान
को
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Bhuwan Singh
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