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Bashir Badr
na jee bhar ke dekha na kuchh baat ki
na jee bhar ke dekha na kuchh baat ki | न जी भर के देखा न कुछ बात की
- Bashir Badr
न
जी
भर
के
देखा
न
कुछ
बात
की
बड़ी
आरज़ू
थी
मुलाक़ात
की
उजालों
की
परियाँ
नहाने
लगीं
नदी
गुनगुनाई
ख़यालात
की
मैं
चुप
था
तो
चलती
हवा
रुक
गई
ज़बाँ
सब
समझते
हैं
जज़्बात
की
मुक़द्दर
मिरी
चश्म-ए-पुर-आब
का
बरसती
हुई
रात
बरसात
की
कई
साल
से
कुछ
ख़बर
ही
नहीं
कहाँ
दिन
गुज़ारा
कहाँ
रात
की
- Bashir Badr
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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तुमको
हम
ही
झूठ
लगेंगे
लेकिन
दरिया
झूठा
है
पहले
हमको
चाँद
मिला
था
फिर
दरिया
को
चाँद
मिला
Abhishar Geeta Shukla
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बीच
भँवर
से
कश्ती
कैसे
बच
निकली
बहुत
दिनों
तक
दरिया
भी
हैरान
रहा
Madan Mohan Danish
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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इक
और
दरिया
का
सामना
था
'मुनीर'
मुझ
को
मैं
एक
दरिया
के
पार
उतरा
तो
मैंने
देखा
Muneer Niyazi
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ये
इश्क़
नहीं
आसाँ
इतना
ही
समझ
लीजे
इक
आग
का
दरिया
है
और
डूब
के
जाना
है
Jigar Moradabadi
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उसी
वक़्त
अपने
क़दम
मोड़
लेना
नदी
पार
से
जब
इशारा
करूँँगा
Siddharth Saaz
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ये
आग
वाग
का
दरिया
तो
खेल
था
हम
को
जो
सच
कहें
तो
बड़ा
इम्तिहान
आँसू
हैं
Abhishek shukla
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यहाँ
तुम
देखना
रुतबा
हमारा
हमारी
रेत
है
दरिया
हमारा
Kushal Dauneria
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अज़्मतें
सब
तिरी
ख़ुदाई
की
हैसियत
क्या
मिरी
इकाई
की
मिरे
होंटों
के
फूल
सूख
गए
तुम
ने
क्या
मुझ
से
बे-वफ़ाई
की
सब
मिरे
हाथ
पाँव
लफ़्ज़ों
के
और
आँखें
भी
रौशनाई
की
मैं
ही
मुल्ज़िम
हूँ
मैं
ही
मुंसिफ़
हूँ
कोई
सूरत
नहीं
रिहाई
की
इक
बरस
ज़िंदगी
का
बीत
गया
तह
जमी
एक
और
काई
की
अब
तरसते
रहो
ग़ज़ल
के
लिए
तुम
ने
लफ़्ज़ों
से
बे-वफ़ाई
की
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Bashir Badr
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काग़ज़
में
दब
के
मर
गए
कीड़े
किताब
के
दीवाना
बे-पढ़े-लिखे
मशहूर
हो
गया
Bashir Badr
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दुश्मनी
जम
कर
करो
लेकिन
ये
गुंजाइश
रहे
जब
कभी
हम
दोस्त
हो
जाएँ
तो
शर्मिंदा
न
हों
Bashir Badr
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शोहरत
की
बुलंदी
भी
पल
भर
का
तमाशा
है
जिस
डाल
पे
बैठे
हो
वो
टूट
भी
सकती
है
Bashir Badr
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मुसाफ़िर
के
रस्ते
बदलते
रहे
मुक़द्दर
में
चलना
था
चलते
रहे
मिरे
रास्तों
में
उजाला
रहा
दिए
उस
की
आँखों
में
जलते
रहे
कोई
फूल
सा
हाथ
काँधे
पे
था
मिरे
पाँव
शो'लों
पे
जलते
रहे
सुना
है
उन्हें
भी
हवा
लग
गई
हवाओं
के
जो
रुख़
बदलते
रहे
वो
क्या
था
जिसे
हम
ने
ठुकरा
दिया
मगर
उम्र
भर
हाथ
मलते
रहे
मोहब्बत
अदावत
वफ़ा
बे-रुख़ी
किराए
के
घर
थे
बदलते
रहे
लिपट
कर
चराग़ों
से
वो
सो
गए
जो
फूलों
पे
करवट
बदलते
रहे
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Bashir Badr
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