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Banne Miyan Jauhar
subh hui aur andheri bhaagi
subh hui aur andheri bhaagi | सुब्ह हुई और अँधेरी भागी
- Banne Miyan Jauhar
सुब्ह
हुई
और
अँधेरी
भागी
हक़
की
ख़िल्क़त
सारी
जागी
फूलों
से
सब
बाग़
हैं
महके
और
पखेरू
उठ
कर
चहके
कुकड़ूँ
कूँ
है
मुर्ग़
के
लब
पर
फज्र
हुई
कहता
है
घर
घर
झिलमिल
झिलमिल
कर
के
तारे
दिल
को
लुभा
लेते
थे
प्यारे
लेकिन
वो
बे-चारे
सिधारे
जो
थे
फ़लक
पर
चाँद
सितारे
सुब्ह
को
जाते
रात
को
आते
अपनी
झलक
हैं
हम
को
दिखाते
बस
यही
उन
का
काम
है
बच्चो
इन
तारों
से
तुम
भी
सबक़
लो
जो
कुछ
भी
हैं
काम
तुम्हारे
मत
घबराओ
उन
के
मारे
तुम
को
भी
है
यूँँ
ही
चमकना
देखो
काम
से
तुम
मत
थकना
दुनिया
में
तुम
इज़्ज़त
पाना
दौलत
पाना
शोहरत
पाना
काम
वो
करना
नाम
हो
जिस
से
हासिल
कुछ
इनआ'म
हो
जिस
से
सस्ती
ग़फ़्लत
छोड़ो
भाई
इस
से
किस
ने
इज़्ज़त
पाई
इल्म
का
है
दुनिया
में
उजाला
इस
से
पड़े
जब
तुम
को
पाला
मेहनत
करना
जी
को
लगाना
आलिम
बन
कर
इज़्ज़त
पाना
क़ौम-ओ-वतन
की
करना
ख़िदमत
है
यही
दौलत
है
यही
राहत
- Banne Miyan Jauhar
कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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अगर
तुम्हारी
अना
ही
का
है
सवाल
तो
फिर
चलो
मैं
हाथ
बढ़ाता
हूँ
दोस्ती
के
लिए
Ahmad Faraz
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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होश
वालों
को
ख़बर
क्या
बे-ख़ुदी
क्या
चीज़
है
इश्क़
कीजे
फिर
समझिए
ज़िंदगी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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हम
ने
क़ुबूल
कर
लिया
अपना
हर
एक
जुर्म
अब
आप
भी
तो
अपनी
अना
छोड़
दीजिए
Harsh saxena
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मोहब्बत
नेक-ओ-बद
को
सोचने
दे
ग़ैर-मुमकिन
है
बढ़ी
जब
बे-ख़ुदी
फिर
कौन
डरता
है
गुनाहों
से
Arzoo Lakhnavi
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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