kahii bhi zindagi apni guzaar saka tha | कहीं भी ज़िंदगी अपनी गुज़ार सकता था

  - Balraj Bakshi
कहींभीज़िंदगीअपनीगुज़ारसकताथा
वोचाहतातोमैंदानिस्ताहारसकताथा
ज़मीनपाँवसेमेरेलिपटगईवर्ना
मैंआसमानसेतारेउतारसकताथा
जलारहीहैंजिसेतेज़धूपकीनज़रें
वोअब्रबाग़कीक़िस्मतसँवारसकताथा
अजीबमो'जिज़ा-कारीथीउसकीबातोंमें
किवोयक़ींकेजज़ीरेउभारसकताथा
मिरेमकानमेंदीवारहैदरवाज़ा
मुझेतोकोईभीघरसेपुकारसकताथा
पुर-इत्मीनानथींउसकीरिफाक़तें'बलराज'
वोआइनेमेंमुझेभीउतारसकताथा
  - Balraj Bakshi
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