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Bakul Dev
kaun kahtaa hai thehar jaana hai
kaun kahtaa hai thehar jaana hai | कौन कहता है ठहर जाना है
- Bakul Dev
कौन
कहता
है
ठहर
जाना
है
रंग
चढ़ना
है
उतर
जाना
है
ज़िंदगी
से
रही
सोहबत
बरसों
जाते
जाते
ही
असर
जाना
है
टूटने
को
हैं
सदाएँ
मेरी
ख़ामुशी
तुझ
को
बिखर
जाना
है
ख़्वाब
नद्दी
सा
गुज़र
जाएगा
दश्त
आँखों
में
ठहर
जाना
है
कोई
दिन
हम
भी
न
याद
आएँगे
आख़िरश
तू
भी
बिसर
जाना
है
कोई
दरिया
न
समुंदर
न
सराब
तिश्नगी
बोल
किधर
जाना
है
लग़्ज़िशें
जाएँगी
जाते
जाते
नश्शा
माना
कि
उतर
जाना
है
नक़्शा
छोड़ा
है
हवा
ने
कोई
कौन
सी
सम्त
सफ़र
जाना
है
ज़िंदगी
से
हैं
पशेमाँ
हम
भी
कल
ये
दावा
था
कि
मर
जाना
है
- Bakul Dev
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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किसी
ने
कहा
था
टूटी
हुई
नाव
में
चलो
दरिया
के
साथ
आप
की
रंजिश
फ़ुज़ूल
है
Shahid Zaki
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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उतरी
हुई
नदी
को
समुंदर
कहेगा
कौन
सत्तर
अगर
हैं
आप
बहत्तर
कहेगा
कौन
पपलू
से
उनकी
बीवी
ने
कल
रात
कह
दिया
मैं
देखती
हूँ
आपको
शौहर
कहेगा
कौन
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Paplu Lucknawi
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हैरत
से
जो
यूँँ
मेरी
तरफ़
देख
रहे
हो
लगता
है
कभी
तुम
ने
समुंदर
नहीं
देखा
Aanis Moin
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चलो
न
फिर
से
दरिया
के
नज़दीक
चलें
चलो
न
फिर
से
डुबकी
साथ
लगाएँगे
Atul K Rai
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इक
मुहब्बत
से
भरी
उस
ज़िंदगी
के
ख़्वाब
हैं
पेड़
दरिया
और
पंछी
तेरे
मेरे
ख़्वाब
हैं
Neeraj Nainkwal
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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ज़िन्दगी
पर
लिख
दिया
था
नाम
मैंने
राम
का
और
फिर
दुख
के
समुंदर
पार
सारे
हो
गए
Tanoj Dadhich
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अब
उजड़ने
के
हम
न
बसने
के
कट
गए
जाल
सारे
फँसने
के
तजरबों
में
न
ज़हर
ज़ाएअ'
कर
सीख
आदाब
पहले
डसने
के
उस
से
कहियो
जो
ख़ुद
में
डूबा
है
तुझ
पे
बादल
नहीं
बरसने
के
मिलना-जुलना
अभी
भी
है
लेकिन
हाथ
से
हाथ
अब
न
मसने
के
नक़्श-ए-सानी
हैं
झिलमिलाते
सराब
नक़्श-ए-अव्वल
थे
पावँ
धंसने
के
ऐसा
वीराँ
हुआ
है
दिल
इस
बार
अब
के
इम्काँ
नहीं
हैं
बसने
के
रूठे
बच्चों
से
छेड़
करता
हूँ
ढूँढता
हूँ
बहाने
हँसने
के
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मिरे
कुछ
भी
कहे
को
काटता
है
वो
अपने
दाएरे
को
काटता
है
मैं
इस
बाज़ार
के
क़ाबिल
नहीं
हूँ
यहाँ
खोटा
खरे
को
काटता
है
उदास
आँखें
पहनती
हैं
हँसी
को
फिर
आँसू
क़हक़हे
को
काटता
है
न
मुझ
को
हैं
क़ुबूल
अपनी
ख़ताएँ
न
वो
अपने
लिखे
को
काटता
है
तवज्जोह
चाहता
है
ग़म
पुराना
सो
रह
रह
कर
नए
को
काटता
है
वही
आँसू
वही
माज़ी
के
क़िस्से
जिसे
देखो
कटे
को
काटता
है
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जो
है
चश्मा
उसे
सराब
करो
शहर-ए-तिश्ना
में
इंक़लाब
करो
मुस्कुराने
का
फ़न
तो
बअ'द
का
है
पहले
साअ'त
का
इंतिख़ाब
करो
अब
के
ता'बीर
मसअला
न
रहे
ये
जो
दुनिया
है
इस
को
ख़्वाब
करो
और
पकने
दो
इश्क़
की
मिट्टी
पार
उजलत
में
मत
चनाब
करो
अहद-ए-नौ
के
अजब
तक़ाज़े
हैं
जो
है
ख़ुशबू
उसे
गुलाब
करो
यूँँ
ख़ुशी
की
हवस
न
जाएगी
एक
इक
ग़म
को
बे-नक़ाब
करो
हरसिंगारों
से
बोलती
है
ज़मीं
अब
की
रुत
में
मुझे
किताब
करो
पहले
पूछो
सवाल
अपने
तईं
फिर
ख़ला
से
तलब
जवाब
करो
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ये
किस
की
याद
का
दिल
पर
रफ़ू
था
कि
बह
जाने
पे
आमादा
लहू
था
चमकते
हैं
जो
पत्थर
से
यहाँ
अब
उन्हीं
पलकों
में
सैल-ए-आबजू
था
कशिश
तुझ
सी
न
थी
तेरे
ग़मों
में
लब-ओ-लहजा
मगर
हाँ
हू-ब-हू
था
उजाले
सी
कोई
शय
बच
गई
थी
उस
इक
लम्हे
में
जब
मैं
था
न
तू
था
थमी
इक
नब्ज़
तो
उक़्दा
खुला
ये
ख़मोशी
का
सरापा
हा-ओ-हू
था
मिले
अब
के
तो
रोए
टूट
कर
हम
गुनाह
अपनी
सज़ा
के
रू-ब-रू
था
कभी
ख़ुशबू
हुआ
करते
थे
हम
भी
कभी
क़िस्सा
हमारा
कू-ब-कू
था
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जान
ले
ले
न
ज़ब्त-ए-आह
कहीं
रो
लिया
कीजे
गाह
गाह
कहीं
इब्तिदाई
जो
एक
ख़दशा
था
खुल
न
जाए
उसी
पे
राह
कहीं
होने
वाली
है
ये
फ़ज़ा
रंगीन
अब्र
होने
लगे
सियाह
कहीं
ये
सुहुलत
है
ज़िंदगी
को
बहुत
रब्त
होता
रहे
निबाह
कहीं
और
कुछ
देर
ग़म
नज़र
में
रख
क्या
ख़बर
मिल
ही
जाए
थाह
कहीं
हैफ़
सर
से
गुज़र
गया
पानी
धोने
आए
थे
हम
गुनाह
कहीं
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