ham-kalaami men dar-o-deewar se | हम-कलामी में दर-ओ-दीवार से

  - Bahram Tariq
हम-कलामीमेंदर-ओ-दीवारसे
कितनेजज़्बेरहगएइज़हारसे
धूपबढ़तेहीजुदाहोजाएगा
साया-ए-दीवारभीदीवारसे
हिज्रकालम्हामुकम्मलहोगया
रौशनीजबकटगईमीनारसे
टूटकरबिखरेख़ुदअपनेसोगमें
दिललगाकरदर्दकेरुख़्सारसे
नीम-वागलियाँचुराकरलाईहैं
कैसासपनादीदा-ए-बेदारसे
कितनेहीमायूसलम्होंकेभँवर
हमनेनापेज़ेहनकेपरकारसे
उम्रभर'तारिक़'उलझतेहीरहे
जिस्मकीगिरतीहुईदीवारसे
  - Bahram Tariq
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