ye baar-e-gham bhi uthaya nahin bahut din se | ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से

  - Azhar Iqbal
येबार-ए-ग़मभीउठायानहींबहुतदिनसे
किउसनेहमकोरुलायानहींबहुतदिनसे
चलोकिख़ाकउड़ाएँचलोशराबपिएँ
किसीकाहिज्रमनायानहींबहुतदिनसे
येकैफ़ियतहैमेरीजानअबतुझेखोकर
किहमनेख़ुदकोभीपायानहींबहुतदिनसे
हरएकशख़्सयहाँमहव-ए-ख़्वाबलगताहै
किसीनेहमकोजगायानहींबहुतदिनसे
येख़ौफ़हैकिरगोंमेंलहूजमजाए
तुम्हेंगलेसेलगायानहींबहुतदिनसे
  - Azhar Iqbal
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