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Azhar Iqbal
itnaa sangeen paap kaun kare
itnaa sangeen paap kaun kare | इतना संगीन पाप कौन करे
- Azhar Iqbal
इतना
संगीन
पाप
कौन
करे
मेरे
दुख
पर
विलाप
कौन
करे
चेतना
मर
चुकी
है
लोगों
की
पाप
पर
पश्चाताप
कौन
करे
- Azhar Iqbal
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यूँँ
दिल
को
तड़पने
का
कुछ
तो
है
सबब
आख़िर
या
दर्द
ने
करवट
ली
या
तुम
ने
इधर
देखा
Jigar Moradabadi
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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कोई
अटका
हुआ
है
पल
शायद
वक़्त
में
पड़
गया
है
बल
शायद
दिल
अगर
है
तो
दर्द
भी
होगा
इस
का
कोई
नहीं
है
हल
शायद
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Gulzar
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दर्द
मिन्नत-कश-ए-दवा
न
हुआ
मैं
न
अच्छा
हुआ
बुरा
न
हुआ
Mirza Ghalib
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मैं
शा'इर
हूँ
मोहब्बत
का
मिरे
दुख
भी
रसीले
हैं
Farhat Abbas Shah
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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दर्द
सहने
का
अलग
अंदाज़
है
जी
रहे
हैं
हम
अदा
की
ज़िंदगी
Farhat Abbas Shah
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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हुआ
ही
क्या
जो
वो
हमें
मिला
नहीं
बदन
ही
सिर्फ़
एक
रास्ता
नहीं
ये
पहला
इश्क़
है
तुम्हारा
सोच
लो
मेरे
लिए
ये
रास्ता
नया
नहीं
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Azhar Iqbal
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तुम्हारे
आने
की
उम्मीद
बर
नहीं
आती
मैं
राख
होने
लगा
हूँ
दिए
जलाते
हुए
Azhar Iqbal
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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जब
भी
उसकी
गली
में
भ्रमण
होता
है
उसके
द्वार
पर
आत्मसमर्पण
होता
है
किस
किस
से
तुम
दोष
छुपाओगे
अपने
प्रिये
अपना
मन
भी
दर्पण
होता
है
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Azhar Iqbal
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है
अब
भी
बिस्तर-ए-जाँ
पर
तिरे
बदन
की
शिकन
मैं
ख़ुद
ही
मिटने
लगा
हूँ
उसे
मिटाते
हुए
Azhar Iqbal
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