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Atif khan
phool jis men dale the chhup kar vo basta yaad hai
phool jis men dale the chhup kar vo basta yaad hai | फूल जिस में डाले थे छुप कर वो बस्ता याद है
- Atif khan
फूल
जिस
में
डाले
थे
छुप
कर
वो
बस्ता
याद
है
रख
लिया
था
सर
कभी
जिस
पर
वो
काँधा
याद
है
- Atif khan
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ख़ास
तो
कुछ
भी
नहीं
बदला
तुम्हारे
बाद
में
पहले
गुम
रहता
था
तुम
में,
अब
तुम्हारी
याद
में
मोल
हासिल
हो
गया
है
मुझको
इक-इक
शे'र
का
सब
दिलासे
दे
रहे
हैं
मुझको
"जस्सर"
दाद
में
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Avtar Singh Jasser
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अच्छे
हो
कर
लौट
गए
सब
घर
लेकिन
मौत
का
चेहरा
याद
रहा
बीमारों
को
Shariq Kaifi
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मुझे
याद
करने
से
ये
मुद्दआ
था
निकल
जाए
दम
हिचकियाँ
आते
आते
Dagh Dehlvi
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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तेरी
मजबूरियाँ
दुरुस्त
मगर
तूने
वा'दा
किया
था
याद
तो
कर
Nasir Kazmi
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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अपनी
तन्हाई
मिरे
नाम
पे
आबाद
करे
कौन
होगा
जो
मुझे
उस
की
तरह
याद
करे
Parveen Shakir
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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बैठे
बिठाए
हम
को
सनम
याद
आ
गए
फिर
उन
के
साथ
उन
के
करम
याद
आ
गए
कोई
जो
राह
चलते
अचानक
मिला
मियाँ
हम
को
हर
एक
रंज-ओ-अलम
याद
आ
गए
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shaan manral
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उस
इमारत
में
कहीं
पर
सीढ़ियों
के
सामने
वो
जहाँ
तन्हा
मिला
मुझ
सेे
वो
कमरा
याद
है
Atif khan
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नज़रें
तो
वो
बचाता
रहा
सपनो
में
फिर
भी
आता
रहा
वो
मुझे
बस
सताता
रहा
मैं
उसे
बस
मनाता
रहा
हाल
अपना
बताता
रहा
और
उसको
हँसाता
रहा
जाम
साक़ी
पिलाता
रहा
और
ग़ज़लें
मैं
गाता
रहा
लोगों
ने
जब
मुझे
पकड़ा
तो
मुझको
दोषी
बताता
रहा
चोर
है
बोल
कर
ख़ुद
कहीं
वो
खड़ा
मुस्कुराता
रहा
फिर
सज़ा
मुझको
होने
लगी
और
वो
दिल
चुराता
रहा
चाँद
तो
वो
नहीं
था
मगर
चाँदनी
वो
बिछाता
रहा
लिखते
लिखते
कहानी
मिरी
हर
किसी
को
सुनाता
रहा
शाम
होती
रही
और
वो
दूर
आतिफ़
से
जाता
रहा
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Atif khan
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लो
अब
याद
आने
लगा
वो
समा
जब
किसी
ने
कहा
था
मुझे
सब
पता
है
Atif khan
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तुम
न
जाने
मिरी
क्या
हो
इकरा
दर्द
से
मेरे
शिफ़ा
हो
इकरा
तुम
अलग
हो
हाँ
जुदा
हो
इकरा
ख़ाली
सा
एक
समा
हो
इकरा
धूप
हो
छाँव
हो
बारिश
वाली
एक
मीठी
सी
फ़ज़ा
हो
इकरा
तुम
मिरी
दोस्त
नहीं
हो
तुम
तो
मेरे
ज़ख़्मों
की
दवा
हो
इकरा
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Atif khan
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ये
भरोसा
नहीं
कर
सकते
के
वो
सच्चा
है
हाँ
मगर
यार
वो
इंसान
बड़ा
अच्छा
है
क्या
हुआ
जो
मिरा
दिल
थोड़ा
अभी
कच्चा
है
इश्क़
का
तुझ
से
इरादा
तो
मिरा
पक्का
है
ये
क़लम
उस
के
लिए
चलती
है
मेरी
'आतिफ़'
जिसने
इक
फूल
किताबों
में
छुपा
रक्खा
है
नींद
रातों
में
न
आए
तो
समझ
लेना
तुम
अब
शब-ए-हिज्र-ए-मुदाम
आएगी
ये
पक्का
है
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Atif khan
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