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Atif khan
nazren to vo bachaata raha
nazren to vo bachaata raha | नज़रें तो वो बचाता रहा
- Atif khan
नज़रें
तो
वो
बचाता
रहा
सपनो
में
फिर
भी
आता
रहा
वो
मुझे
बस
सताता
रहा
मैं
उसे
बस
मनाता
रहा
हाल
अपना
बताता
रहा
और
उसको
हँसाता
रहा
जाम
साक़ी
पिलाता
रहा
और
ग़ज़लें
मैं
गाता
रहा
लोगों
ने
जब
मुझे
पकड़ा
तो
मुझको
दोषी
बताता
रहा
चोर
है
बोल
कर
ख़ुद
कहीं
वो
खड़ा
मुस्कुराता
रहा
फिर
सज़ा
मुझको
होने
लगी
और
वो
दिल
चुराता
रहा
चाँद
तो
वो
नहीं
था
मगर
चाँदनी
वो
बिछाता
रहा
लिखते
लिखते
कहानी
मिरी
हर
किसी
को
सुनाता
रहा
शाम
होती
रही
और
वो
दूर
आतिफ़
से
जाता
रहा
- Atif khan
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है
ज़माना
बस
रही
ख़िल्क़त
नहीं
है
फ़साना
बस
रही
लज़्ज़त
नहीं
Atif khan
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उस
इमारत
में
कहीं
पर
सीढ़ियों
के
सामने
वो
जहाँ
तन्हा
मिला
मुझ
सेे
वो
कमरा
याद
है
Atif khan
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मेरे
हालात
क्यूँ
न
समझा
वो
मेरे
जज़्बात
क्यूँ
न
समझा
वो
मैं
मुहब्बत
नहीं
दिखाता
हूँ
इतनी
सी
बात
क्यूँ
न
समझा
वो
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Atif khan
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यार
तुम
भी
कमाल
करते
हो
फिर
बुरा
मेरा
हाल
करते
हो
वक़्त
पर
ख़ुद
कभी
नहीं
मिलते
और
मुझ
से
मलाल
करते
हो
इक
तो
ग़लती
मिरी
नहीं
होती
तुम
मुझी
से
सवाल
करते
हो
कोई
खिलता
गुलाब
लगते
हो
जब
भी
गालों
को
लाल
करते
हो
ये
बताओ
ये
क़ुदरती
है
या
रोज़
इन
पर
गुलाल
करते
हो
हुस्न
भी
ठीक
है
मगर
'आतिफ'
बातें
तुम
बे-मिसाल
करते
हो
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Atif khan
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ये
भरोसा
नहीं
कर
सकते
के
वो
सच्चा
है
हाँ
मगर
यार
वो
इंसान
बड़ा
अच्छा
है
क्या
हुआ
जो
मिरा
दिल
थोड़ा
अभी
कच्चा
है
इश्क़
का
तुझ
से
इरादा
तो
मिरा
पक्का
है
ये
क़लम
उस
के
लिए
चलती
है
मेरी
'आतिफ़'
जिसने
इक
फूल
किताबों
में
छुपा
रक्खा
है
नींद
रातों
में
न
आए
तो
समझ
लेना
तुम
अब
शब-ए-हिज्र-ए-मुदाम
आएगी
ये
पक्का
है
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Atif khan
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