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Atif khan
ye bharosa nahin kar sakte ke vo sachcha hai
ye bharosa nahin kar sakte ke vo sachcha hai | ये भरोसा नहीं कर सकते के वो सच्चा है
- Atif khan
ये
भरोसा
नहीं
कर
सकते
के
वो
सच्चा
है
हाँ
मगर
यार
वो
इंसान
बड़ा
अच्छा
है
क्या
हुआ
जो
मिरा
दिल
थोड़ा
अभी
कच्चा
है
इश्क़
का
तुझ
से
इरादा
तो
मिरा
पक्का
है
ये
क़लम
उस
के
लिए
चलती
है
मेरी
'आतिफ़'
जिसने
इक
फूल
किताबों
में
छुपा
रक्खा
है
नींद
रातों
में
न
आए
तो
समझ
लेना
तुम
अब
शब-ए-हिज्र-ए-मुदाम
आएगी
ये
पक्का
है
- Atif khan
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मोहब्बत
के
ख़ातिर
जो
नीलाम
हम
थे
जवानी
थी
जिस
वक़्त
बदनाम
हम
थे
गवारा
नहीं
था
उसे
नाम
सुनना
किसी
क़ब्र
पर
वो
लिखा
नाम
हम
थे
न
वो
वक़्त
लौटा
न
वो
शख़्स
लौटा
कभी
जिसकी
यादों
में
गुमनाम
हम
थे
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Atif khan
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है
ज़माना
बस
रही
ख़िल्क़त
नहीं
है
फ़साना
बस
रही
लज़्ज़त
नहीं
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नज़रें
तो
वो
बचाता
रहा
सपनो
में
फिर
भी
आता
रहा
वो
मुझे
बस
सताता
रहा
मैं
उसे
बस
मनाता
रहा
हाल
अपना
बताता
रहा
और
उसको
हँसाता
रहा
जाम
साक़ी
पिलाता
रहा
और
ग़ज़लें
मैं
गाता
रहा
लोगों
ने
जब
मुझे
पकड़ा
तो
मुझको
दोषी
बताता
रहा
चोर
है
बोल
कर
ख़ुद
कहीं
वो
खड़ा
मुस्कुराता
रहा
फिर
सज़ा
मुझको
होने
लगी
और
वो
दिल
चुराता
रहा
चाँद
तो
वो
नहीं
था
मगर
चाँदनी
वो
बिछाता
रहा
लिखते
लिखते
कहानी
मिरी
हर
किसी
को
सुनाता
रहा
शाम
होती
रही
और
वो
दूर
आतिफ़
से
जाता
रहा
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Atif khan
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पहले
जैसे
मिरे
हालात
से
डरता
हूँ
मैं
अब
मुहब्बत
की
तो
हर
बात
से
डरता
हूँ
मैं
Atif khan
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लो
अब
याद
आने
लगा
वो
समा
जब
किसी
ने
कहा
था
मुझे
सब
पता
है
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