junoon-e-shauq ab bhi kam nahin hai | जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

  - Asrar Ul Haq Majaz
जुनून-ए-शौक़अबभीकमनहींहै
मगरवोआजभीबरहमनहींहै
बहुतमुश्किलहैदुनियाकासँवरना
तिरीज़ुल्फ़ोंकापेच-ओ-ख़मनहींहै
बहुतकुछऔरभीहैइसजहाँमें
येदुनियामहज़ग़महीग़मनहींहै
तक़ाज़ेक्यूँँकरूँँपैहमसाक़ी
किसेयाँफ़िक्र-ए-बेश-ओ-कमनहींहै
उधरमश्कूकहैमेरीसदाक़त
इधरभीबद-गुमानीकमनहींहै
मिरीबर्बादियोंकाहम-नशीनो
तुम्हेंक्याख़ुदमुझेभीग़मनहींहै
अभीबज़्म-ए-तरबसेक्याउठूँमैं
अभीतोआँखभीपुर-नमनहींहै
ब-ईंसैल-ए-ग़मसैल-ए-हवादिस
मिरासरहैकिअबभीख़मनहींहै
'मजाज़'इकबादा-कशतोहैयक़ीनन
जोहमसुनतेथेवोआलमनहींहै
  - Asrar Ul Haq Majaz
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