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A R Sahil "Aleeg"
vaqt apna do boodhe maa-baap ko hai ye haq unka
vaqt apna do boodhe maa-baap ko hai ye haq unka | वक़्त अपना दो, बूढ़े माँ-बाप को, है ये हक़ उनका
- A R Sahil "Aleeg"
वक़्त
अपना
दो,
बूढ़े
माँ-बाप
को,
है
ये
हक़
उनका
तुम
भी
बच्चे
रहोगे,
बूढ़े
कभी
वो
नहीं
होंगे
- A R Sahil "Aleeg"
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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तमाम
मस'अले
उठाए
फिर
रहे
हैं
हम
इसीलिए
भी
चलते
चलते
थक
गए
हैं
हम
थे
कितने
कम-नसीब
हम
कि
राबता
न
था
हैं
कितने
ख़ुशनसीब
तुझ
को
छू
रहे
हैं
हम
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Siddharth Saaz
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
Vashu Pandey
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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ज़ख़्म
ये
इश्क़
का
इक
भी
भरता
नहीं
और
मैं
हूँ
कि
इतने
पे
मरता
नहीं
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
में
मुझ
को
मिली
जो
बे-वफ़ाई
अस्ल
में
ये
तो
सज़ा
सच
कहने
की
है
A R Sahil "Aleeg"
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मलेंगे
हाथों
को
अपने
गवाह
और
सुबूत
ख़ुलूस-ओ-इश्क़
का
जब
हम
निसाब
लिक्खेंगे
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
भी
है
भला
चीज़
कुछ
काम
की
भाव
रद्दी
के
भी
दोस्त
बिकता
नहीं
A R Sahil "Aleeg"
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मशहूर
जब
हो
नाम
से
मेरे
जहाँ
में
तुम
है
इश्क़
जग-अयाँ
तो
छुपाया
भी
क्या
करें
A R Sahil "Aleeg"
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