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A R Sahil "Aleeg"
pahle pehal jo ho ga.e naakaam ishq men
pahle pehal jo ho ga.e naakaam ishq men | पहले पहल जो हो गए नाकाम इश्क़ में
- A R Sahil "Aleeg"
पहले
पहल
जो
हो
गए
नाकाम
इश्क़
में
ये
मशवरा
है
इश्क़
दुबारा
न
कीजिए
- A R Sahil "Aleeg"
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हम
तो
समझे
थे
कि
इक
ज़ख़्म
है
भर
जाएगा
क्या
ख़बर
थी
कि
रग-ए-जाँ
में
उतर
जाएगा
Parveen Shakir
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मुझे
ख़बर
नहीं
ग़म
क्या
है
और
ख़ुशी
क्या
है
ये
ज़िंदगी
की
है
सूरत
तो
ज़िंदगी
क्या
है
Ahsan Marahravi
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खड़े
होकर
कहा
ये
आइने
के
रु-बा-रु
मैंने
शजर
तुमको
कहीं
मिल
जाए
मुझको
इत्तिला
करना
Shajar Abbas
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सफ़र
के
ब'अद
भी
मुझ
को
सफ़र
में
रहना
है
नज़र
से
गिरना
भी
गोया
ख़बर
में
रहना
है
Aadil Raza Mansoori
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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मुझे
ख़राब
किया
उस
ने
हाँ
किया
होगा
उसी
से
पूछिए
मुझ
को
ख़बर
ज़ियादा
नहीं
Zafar Iqbal
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दोस्त
दिल
रखने
को
करते
हैं
बहाने
क्या
क्या
रोज़
झूटी
ख़बर-ए-वस्ल
सुना
जाते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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हम
दो
बंदे
हैं
और
सिगरेट
एक
अब
ख़बर
होगी
दोस्ती
की
दोस्त
Muzdum Khan
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हद
से
ज़्यादा
भी
प्यार
मत
करना
जी
हर
इक
पे
निसार
मत
करना
क्या
ख़बर
किस
जगह
पे
रुक
जाए
साँस
का
एतिबार
मत
करना
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Qamar Ejaz
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मैदान
छोड़
देने
से
मैं
बच
तो
जाऊँगा
लेकिन
जो
ये
ख़बर
मेरी
माँ
तक
पहुँच
गई
Munawwar Rana
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गुनाहों
ख़ताओं
से
वो
पाक
होते
हैं
नबी
का
नमाज़-ए-जनाज़ा
नहीं
होता
A R Sahil "Aleeg"
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निभा
लेती
वफ़ा
गर
इश्क़
में
तुम
तो
यक़ीं
जानो
मैं
शाइर
हूँ
किताबों
में
जहाँ
भर
में
अमर
होती
A R Sahil "Aleeg"
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ऐसा
था,
वैसा
था,
ये
था,
वो
था,
हर
बात
में
था,
था
बाक़ी
है
ज़िन्दगी
तेरी?
या
ये
भी
बन
चुका
है
था
A R Sahil "Aleeg"
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मेरे
ज़ब्त-ए-ग़म
से
निकल
कर
दु'आ
चली
आई
लब
पर
मचल
कर
दु'आ
बिछड़
कर
मुझी
से
मेरे
वस्ल
को
करेंगे
वो
करवट
बदल
कर
दु'आ
कभी
दिल
न
उनका
कोई
तोड़
दे
वो
माँगे
कई
दिल
कुचल
कर
दु'आ
ये
इंसान
क्या
गर
ख़ुदा
चाहे
तो
यहाँ
बुत
भी
कर
दे
पिघल
कर
दु'आ
हुआ
आज
क्या
उनको
मुल्हिद
हैं
जो
लगे
करने
वो
दिल
मसल
कर
दु'आ
ख़ुदा
पहुँचे
तुझ
तक
है
ये
आरज़ू
मेरी
मग़्फ़िरत
की
उछल
कर
दु'आ
गुनाहों
की
'साहिल'
सज़ाएँ
हैं
तय
करें
तौबा
का'बे
में
चल
कर
दु'आ
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A R Sahil "Aleeg"
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बहुत
हैं
शहर
भर
में
अब
मुझे
भी
चाहने
वाले
तुझे
बनना
है
बन
जा
बे-वफ़ा
क्या
फ़र्क़
पड़ता
है
A R Sahil "Aleeg"
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