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A R Sahil "Aleeg"
naa-mukammal ishq jinka zindagaani men
naa-mukammal ishq jinka zindagaani men | ना-मुकम्मल इश्क़ जिनका ज़िंदगानी में
- A R Sahil "Aleeg"
ना-मुकम्मल
इश्क़
जिनका
ज़िंदगानी
में
है
मुकम्मल
इश्क़
उनका
हर
कहानी
में
बे-वफ़ा
को
बे-वफ़ा
कहते
नहीं
लेकिन
इश्क़
करने
का
है
मातम
ज़ीस्त-ए-फ़ानी
में
- A R Sahil "Aleeg"
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ये
रख
रखाव
कभी
ख़त्म
होने
वाला
नहीं
बिछड़ते
वक़्त
भी
तुझको
गुलाब
दूँगा
मैं
Khurram Afaq
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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इश्क़
तिरी
इंतिहा
इश्क़
मिरी
इंतिहा
तू
भी
अभी
ना-तमाम
मैं
भी
अभी
ना-तमाम
Allama Iqbal
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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वो
एक
दिन
जो
तुझे
सोचने
में
गुज़रा
था
तमाम
उम्र
उसी
दिन
की
तर्जुमानी
है
Abhishek shukla
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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अजीब
दर्द
का
रिश्ता
था
सब
के
सब
रोए
शजर
गिरा
तो
परिंदे
तमाम
शब
रोए
Tariq Naeem
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मिरे
सलीक़े
से
मेरी
निभी
मोहब्बत
में
तमाम
उम्र
मैं
नाकामियों
से
काम
लिया
Meer Taqi Meer
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अंजाम
उसके
हाथ
है
आग़ाज़
करके
देख
भीगे
हुए
परों
से
ही
परवाज़
करके
देख
Nawaz Deobandi
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मिले
दिल
को
कोई
हज़रत
ख़दीजा
सी,
मगर
मौला
ज़ुलेख़ा,
उर्वशी
से
हट
के
कोई
भी
नहीं
मिलती
A R Sahil "Aleeg"
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जब
भी
माज़ी
में
खोता
है
दीवाना
टूट
के
रोता
है
सब
ख़ुशियाँ
ख़्वाब
हुईं
जैसे
दिन
रात
यहाँ
दिल
रोता
है
देखो
तो
मेरी
पामाली
पर
दिल
क्या
पत्थर
भी
रोता
है
हम
चंद
दिनों
में
सीख
गए
इस
इश्क़
में
क्या
क्या
होता
है
ख़ुशियों
को
बाँटने
वाला
ही
ख़ुद
दर्द
ग़मों
के
ढोता
है
पत्थर
अक़्लों
पर
पड़ते
हैं
ऐसा
ही
इश्क़
में
होता
है
दिल
इस
दुनिया
से
ऊब
गया
वो
गोली
खा
कर
सोता
है
रह
रह
कर
अश्कों
का
चश्मा
दिल
के
ज़ख़्मों
को
धोता
है
होने
लगता
है
हार्ट
अटैक
जब
ज़िक्र-ए-ग़ज़ाला
होता
है
अब
फ़स्ल-ए-इश्क़
नहीं
उगती
क्यूँ
बीज
वफ़ा
के
बोता
है
इस
नाम-ए-इश्क़
को
छोड़
इस
से
अब
ग़म
में
इज़ाफ़ा
होता
है
साहिल
है
यही
मर्ज़ी-ए-ख़ुदा
हर
पल
क्यूँ
रोना
रोता
है
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A R Sahil "Aleeg"
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इल्म
का
इक़्तिबास
है
बाक़ी
यानी
होश-ओ-हवा
से
है
बाक़ी
वो
सुनेगा
कभी
तो
मेरी
सदा
साँस
जब
तक
है
आस
है
बाक़ी
आप
चाहें
तो
छीन
लें
ये
भी
रूह
पर
जो
लिबास
है
बाक़ी
क्या
बुझाएगा
प्यास
सहरा
की
ख़ुद
ही
दरिया
की
प्यास
है
बाक़ी
जितनी
ख़ुशियाँ
थी
ले
गया
सब
इश्क़
अब
तो
ग़म
की
असास
है
बाक़ी
दम
भी
टूटे
तो
तेरी
चौखट
पर
बस
यही
इल्तिमास
है
बाक़ी
दर्द
आँखों
से
बह
ही
जाएगा
इन
में
काफ़ी
रुवास
है
बाक़ी
तू
भी
निकलेगा
बे-वफ़ा
इक
दिन
ज़ेहन
में
इक
क़ियास
है
बाक़ी
सूरत-ए
दोस्त
आएगा
'साहिल'
जो
भी
मौक़ा-शनास
है
बाक़ी
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A R Sahil "Aleeg"
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इक
तरफ़
है
तहरीक-ए-इबलीस,
पर्तर
तहरीक-ए-रब
भी
जब
हो
हावी
तहरीक-ए-इबलीस,
फिर
पैगम्बर
आते
है
A R Sahil "Aleeg"
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नज़र
से
भी
और
दिल
से
भी
जो
गए
हैं
उतर
कहीं
भी
वो
जाए
तो
क्या
फ़र्क
पड़ता
है
अब
A R Sahil "Aleeg"
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