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A R Sahil "Aleeg"
main bhi ab toot kar aaine sa gaya hooñ bikhar
main bhi ab toot kar aaine sa gaya hooñ bikhar | मैं भी अब टूट कर आइने सा गया हूँ बिखर
- A R Sahil "Aleeg"
मैं
भी
अब
टूट
कर
आइने
सा
गया
हूँ
बिखर
इश्क़
में
जब
से
फेरी
हैं
तुम
ने
निगाहें
सनम
- A R Sahil "Aleeg"
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क़ल्ब-ए-हज़ी
मता-ए-जाँ
यूँँ
शाद
कीजिए
कसरत
के
साथ
आप
हमें
याद
कीजिए
दौलत
में
चाहते
हो
इज़ाफा
अगर
शजर
तो
बेकसों
यतीमों
की
इमदाद
कीजिए
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Shajar Abbas
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वरना
तो
बेवफ़ाई
किसे
कब
मुआ'फ़
है
तू
मेरी
जान
है
सो
तुझे
सब
मुआ'फ़
है
क्यूँ
पूछती
हो
मैंने
तुम्हें
माफ़
कर
दिया
ख़ामोश
हो
गया
हूँ
मैं
मतलब
मुआ'फ़
है
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Vikram Gaur Vairagi
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बहुत
पहले
से
उन
क़दमों
की
आहट
जान
लेते
हैं
तुझे
ऐ
ज़िंदगी
हम
दूर
से
पहचान
लेते
हैं
Firaq Gorakhpuri
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जाँ
हम
दोनों
साथ
में
अच्छे
लगते
हैं
देखो
शे'र
मुकम्मल
अच्छा
लगता
है
Neeraj Neer
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पत्थर
के
ख़ुदा
पत्थर
के
सनम
पत्थर
के
ही
इंसाँ
पाए
हैं
तुम
शहर-ए-मोहब्बत
कहते
हो
हम
जान
बचा
कर
आए
हैं
Sudarshan Fakir
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बस
यूँँ
ही
मेरा
गाल
रखने
दे
मेरी
जान
आज
गाल
पर
अपने
Jaun Elia
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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इक
ये
भी
तो
अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ
है
ऐ
चारागरो
दर्द
बढ़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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अपने
होटों
की
ये
तहरीर
रखो
अपने
पास
हम
वो
'आशिक़
हैं
जो
आँखों
को
पढ़ा
करते
हैं
Meem Alif Shaz
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पहले
लगा
था
हिज्र
में
जाएँगे
जान
से
पर
जी
रहे
हैं
और
भी
हम
इत्मीनान
से
Ankit Maurya
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ऐन
पे
मरते
हैं
ये
शीन-ओ-काफ़
तब
कहीं
जा
के
इश्क़
बनता
है
A R Sahil "Aleeg"
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जब
भी
माज़ी
में
खोता
है
दीवाना
टूट
के
रोता
है
सब
ख़ुशियाँ
ख़्वाब
हुईं
जैसे
दिन
रात
यहाँ
दिल
रोता
है
देखो
तो
मेरी
पामाली
पर
दिल
क्या
पत्थर
भी
रोता
है
हम
चंद
दिनों
में
सीख
गए
इस
इश्क़
में
क्या
क्या
होता
है
ख़ुशियों
को
बाँटने
वाला
ही
ख़ुद
दर्द
ग़मों
के
ढोता
है
पत्थर
अक़्लों
पर
पड़ते
हैं
ऐसा
ही
इश्क़
में
होता
है
दिल
इस
दुनिया
से
ऊब
गया
वो
गोली
खा
कर
सोता
है
रह
रह
कर
अश्कों
का
चश्मा
दिल
के
ज़ख़्मों
को
धोता
है
होने
लगता
है
हार्ट
अटैक
जब
ज़िक्र-ए-ग़ज़ाला
होता
है
अब
फ़स्ल-ए-इश्क़
नहीं
उगती
क्यूँ
बीज
वफ़ा
के
बोता
है
इस
नाम-ए-इश्क़
को
छोड़
इस
से
अब
ग़म
में
इज़ाफ़ा
होता
है
साहिल
है
यही
मर्ज़ी-ए-ख़ुदा
हर
पल
क्यूँ
रोना
रोता
है
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A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
मैं
हासिल
कर
सकता
था
फिर
सोचा
छोड़ो
जाने
दो
A R Sahil "Aleeg"
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इक
ग़ज़ाला
से
कई
बार
किया
मैं
ने
इश्क़
और
कभी
इश्क़
का
में'यार
नहीं
बदला
मैं
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
के
मकतब
में
जब
ले
ही
लिया
है
दाख़िला
आते
आते
मुझको
भी
ज़ेर-ओ-ज़बर
आ
जाएगा
A R Sahil "Aleeg"
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