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A R Sahil "Aleeg"
kuchh ne achha aur kuchh ne bas bura samjha hai mujhko
kuchh ne achha aur kuchh ne bas bura samjha hai mujhko | कुछ ने अच्छा और कुछ ने बस बुरा समझा है मुझको
- A R Sahil "Aleeg"
कुछ
ने
अच्छा
और
कुछ
ने
बस
बुरा
समझा
है
मुझको
जिस
नजर
से
जिसने
देखा
वैसा
ही
जाना
है
मुझको
- A R Sahil "Aleeg"
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किसी
की
बर्क़-ए-नज़र
से
न
बिजलियों
से
जले
कुछ
इस
तरह
की
हो
ता'मीर
आशियाने
की
Anwar Taban
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जिस
पर
हमारी
आँख
ने
मोती
बिछाए
रात
भर
भेजा
वही
काग़ज़
उसे
हम
ने
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Bashir Badr
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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कमाल
ये
है
मुझे
देखती
हैं
वो
आँखें
मलाल
ये
है
उन्हें
देखना
नहीं
आता
Dilawar Ali Aazar
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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शाम
से
आँख
में
नमी
सी
है
आज
फिर
आप
की
कमी
सी
है
Gulzar
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मुयस्सर
हमें
ख़्वाब-ओ-राहत
कहाँ
ज़रा
आँख
झपकी
सहर
हो
गई
Dagh Dehlvi
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ये
इम्तियाज़
ज़रूरी
है
अब
इबादत
में
वही
दु'आ
जो
नज़र
कर
रही
है
लब
भी
करें
Abhishek shukla
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पुतलियाँ
तक
भी
तो
फिर
जाती
हैं
देखो
दम-ए-नज़अ
वक़्त
पड़ता
है
तो
सब
आँख
चुरा
जाते
हैं
Ameer Minai
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हम
भी
तुमको
धोखा
दें
ये
ठीक
नहीं
आँख
के
बदले
आँख
कहाँ
तक
जायज़
है
Gaurav Singh
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न
वो
ख़ुश
मुझ
सेे
न
मैं
ख़ुश
,
ख़फा
वो
भी
है,
मैं
भी
हूँ
मुसलसल
ही
चल
रही
है
लड़ाई
अपनी
ख़ुदास
A R Sahil "Aleeg"
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जब
कभी
भी
हुआ
इश्क़,
फिर
इश्क़
का
इश्क़
और
ही
रहा
A R Sahil "Aleeg"
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जब
मुक़द्दर
में
फ़ना
होना
लिखा
ही
है
हर्ज
क्या
है
फिर
बिखर
कर
ख़ाक
होने
में
A R Sahil "Aleeg"
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जब
भी
माज़ी
में
खोता
है
दीवाना
टूट
के
रोता
है
सब
ख़ुशियाँ
ख़्वाब
हुईं
जैसे
दिन
रात
यहाँ
दिल
रोता
है
देखो
तो
मेरी
पामाली
पर
दिल
क्या
पत्थर
भी
रोता
है
हम
चंद
दिनों
में
सीख
गए
इस
इश्क़
में
क्या
क्या
होता
है
ख़ुशियों
को
बाँटने
वाला
ही
ख़ुद
दर्द
ग़मों
के
ढोता
है
पत्थर
अक़्लों
पर
पड़ते
हैं
ऐसा
ही
इश्क़
में
होता
है
दिल
इस
दुनिया
से
ऊब
गया
वो
गोली
खा
कर
सोता
है
रह
रह
कर
अश्कों
का
चश्मा
दिल
के
ज़ख़्मों
को
धोता
है
होने
लगता
है
हार्ट
अटैक
जब
ज़िक्र-ए-ग़ज़ाला
होता
है
अब
फ़स्ल-ए-इश्क़
नहीं
उगती
क्यूँ
बीज
वफ़ा
के
बोता
है
इस
नाम-ए-इश्क़
को
छोड़
इस
से
अब
ग़म
में
इज़ाफ़ा
होता
है
साहिल
है
यही
मर्ज़ी-ए-ख़ुदा
हर
पल
क्यूँ
रोना
रोता
है
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A R Sahil "Aleeg"
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नवाज़ा
है
इल्म-ओ-हुनर
से
बनाया
है
क़ाबिल
भी
मुझको
ये
सब
ठीक
है
पर
ख़ुदा
तू
ज़रा
सा
मुक़द्दर
भी
देता
A R Sahil "Aleeg"
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