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A R Sahil "Aleeg"
KHuda se jang rahegi tamaam umr meri
KHuda se jang rahegi tamaam umr meri | ख़ुदास जंग रहेगी तमाम उम्र मेरी
- A R Sahil "Aleeg"
ख़ुदास
जंग
रहेगी
तमाम
उम्र
मेरी
नमाज़
पढ़नी
है
टोपी
नहीं
पहननी
मुझे
- A R Sahil "Aleeg"
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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जब
मसअले
न
हल
हो
सकें
बात-चीत
से
फिर
जंग
ही
लड़ो
कि
ज़माना
ख़राब
है
shaan manral
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सूरज
से
जंग
जीतने
निकले
थे
बेवक़ूफ़
सारे
सिपाही
मोम
के
थे
घुल
के
आ
गए
Rahat Indori
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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न
छेड़
नाम-ओ-नसब
और
नस्ल-ओ-रंग
की
बात
कि
चल
निकलती
है
अक्सर
यहीं
से
जंग
की
बात
Zafar naseemi
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ज़ुल्म
फिर
ज़ुल्म
है
बढ़ता
है
तो
मिट
जाता
है
ख़ून
फिर
ख़ून
है
टपकेगा
तो
जम
जाएगा
Sahir Ludhianvi
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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जंग
में
जिन्हे
अब
तक
तुम
झुका
न
पाए
थे
झुक
रही
हैं
वो
सारी
पगड़ियाँ
मोहब्बत
में
Alankrat Srivastava
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सर
पर
हवा-ए-ज़ुल्म
चले
सौ
जतन
के
साथ
अपनी
कुलाह
कज
है
उसी
बाँकपन
के
साथ
Majrooh Sultanpuri
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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देख
ले
ख़ुद
तू,
हम-नज़र
न
छुपी
आरज़ू
दिल
की
चाह
कर
न
छुपी
दिल
ने
पहरे
लगाए
थे
लेकिन
उड़
गई
प्यार
की
ख़बर,
न
छुपी
मानता
हूँ
मैं,
तू
छुपा
लेगा
यह
लगी
दिल
की
भी
अगर
न
छुपी
लाख
ढाँपी
गई
थी
परदों
में
थी
सहर
की
किरन
नज़र
न
छुपी
इश्क़
में
बे-वफ़ाई
ए
पैहम
हम
छुपाया
किए
मगर
न
छुपी
वारदात
ए
शबे-सियाह,
चराग़!
थी
अयाँ
वो
दम
ए
सहर
न
छुपी
तेरी
यादों
से
नम
हुई
ऐसे
ग़मज़दा
दिल
से
चश्म
तर
न
छुपी
ये
मिरे
क़त्ल
की
ख़ता,
'साहिल'
ले
तेरे
आ
गई
है
सर,
न
छुपी
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A R Sahil "Aleeg"
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मेरी
फ़ितरत
में
थी
पहले
से
ही
ये
ख़ामोशी
मुझ
को
ख़ामोश
ही
कर
डाला
है
ये
नीश-ए-इश्क़
A R Sahil "Aleeg"
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तसफ़िया-नफ़्स
को
हासिल
करोगे
जब
हर
दु'आ
पर
ख़ुदा
भी
फिर
कहेगा
कुन
A R Sahil "Aleeg"
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बहुत
हो
चुका
अब
तमाशा
ये
तेरा
शराफ़त
बहुत
ही
दिखा
दी
है
हमने
A R Sahil "Aleeg"
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और
भी
काम
हैं
ज़माने
में
कर
रहे
हम
तो
इश्क़
का
मातम
A R Sahil "Aleeg"
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